प्रिय प्रधानमंत्री जी!
पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों को चूहा समझते हैं। ये “रील बनाना आसान कर दिया” का क्या मतलब होता है? आप बड़े हैं, देश के प्रधानमंत्री हैं, इसका मतलब यह तो कतई नहीं है कि आप कुछ भी बोल दीजिएगा। आप ही बताइए, आपको ये शोभा देता भी है? मतलब, हम सभी को मालूम है कि आपके बात करने में एक जादू है, जिस जगह आप जाते हैं, वहीं से आपका पुराना नाता निकल आता है।
आपको क्यों लगता है कि आप हमेशा कुल टाइप बन के कुछ भी भाषणबाज़ी करके निकल जाएंगे? सभी को मालूम है कि आपकी PR टीम बहुत तगड़ी है। अच्छी बात है, होनी चाहिए। अभी पिछले महीने बिजली मुफ़्त करने वाला जो AI जनरेटेड वीडियो आपने शेयर करवाया, उसमें आप ख़ुद क्यों नहीं थे? सम्राट चौधरी का AI वीडियो हमारे पिता जी को धन्यवाद से रहा है, बताइए। रील बनाना जब आसान है, तो स्थानीय ही किसी प्रतिनिधि से रील बनवाकर सेंड करते तो अच्छा लगता।
एक तो आपको पता है कि भारत देश के लोग बहुत भावुक हैं। हम बिहारी तो और भावुक हैं। आपने ट्रेन की सुविधा देने की बात की, तो भी सूरत और अहमदाबाद में रोज़गार के लिए रह रहे भाई भावुक हो गए। कम से कम बिहार में रोज़गार न मिले, घर जाने में सहूलियत तो होगी। मुझे एक और बात पूछनी है इस चिट्ठी में। यह रवि किशन, जो अपने एक भाषण में कह रहे थे कि प्रधानमंत्री ने ज़िम्मा सौंपा है उनके संदेश को जनता तक पहुँचाने का — सच है क्या? अगर सच है, तो थोड़ा समय निकाल के देखिए कि कैसी फ़ालतू बातें कर रहे हैं वो।
वैसे, एक बात तो बहुत साफ़ है कि आपसे बहुत लोग सीख रहे हैं राजनीति। रवि किशन ने भोजपुरी में फैली अश्लीलता का सारा ज़िम्मा ख़ुद के अलावा बाकियों पर डाल दिया। हमको लगा कि नेहरू जी भोजपुरी इंडस्ट्री में नहीं थे, नहीं तो थोड़ी और आसानी हो जाती। माफ़ कीजिए, एक और सवाल — ये जो भी लोग दल बदलते हैं, वो एक ही दिन में कैसे उसी दल के विरोधी हो जाते हैं, जिनके लिए जान देने का वादा करते हैं? बहुत से सवाल हैं। आप पत्रकार वार्ता तो करेंगे नहीं, इसीलिए सोचा ख़त लिखूं। प्लीज़, इस बार ख़त लिखिएगा।
आपके जवाब के इंतज़ार में,
जिज्ञासु
सन्नी कुमार बोज़ो
बिहार से