Sunday, 26 October 2025

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?


प्रिय प्रधानमंत्री जी!

पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों को चूहा समझते हैं। ये “रील बनाना आसान कर दिया” का क्या मतलब होता है? आप बड़े हैं, देश के प्रधानमंत्री हैं, इसका मतलब यह तो कतई नहीं है कि आप कुछ भी बोल दीजिएगा। आप ही बताइए, आपको ये शोभा देता भी है? मतलब, हम सभी को मालूम है कि आपके बात करने में एक जादू है, जिस जगह आप जाते हैं, वहीं से आपका पुराना नाता निकल आता है।

आपको क्यों लगता है कि आप हमेशा कुल टाइप बन के कुछ भी भाषणबाज़ी करके निकल जाएंगे? सभी को मालूम है कि आपकी PR टीम बहुत तगड़ी है। अच्छी बात है, होनी चाहिए। अभी पिछले महीने बिजली मुफ़्त करने वाला जो AI जनरेटेड वीडियो आपने शेयर करवाया, उसमें आप ख़ुद क्यों नहीं थे? सम्राट चौधरी का AI वीडियो हमारे पिता जी को धन्यवाद से रहा है, बताइए। रील बनाना जब आसान है, तो स्थानीय ही किसी प्रतिनिधि से रील बनवाकर सेंड करते तो अच्छा लगता।

एक तो आपको पता है कि भारत देश के लोग बहुत भावुक हैं। हम बिहारी तो और भावुक हैं। आपने ट्रेन की सुविधा देने की बात की, तो भी सूरत और अहमदाबाद में रोज़गार के लिए रह रहे भाई भावुक हो गए। कम से कम बिहार में रोज़गार न मिले, घर जाने में सहूलियत तो होगी। मुझे एक और बात पूछनी है इस चिट्ठी में। यह रवि किशन, जो अपने एक भाषण में कह रहे थे कि प्रधानमंत्री ने ज़िम्मा सौंपा है उनके संदेश को जनता तक पहुँचाने का — सच है क्या? अगर सच है, तो थोड़ा समय निकाल के देखिए कि कैसी फ़ालतू बातें कर रहे हैं वो।

वैसे, एक बात तो बहुत साफ़ है कि आपसे बहुत लोग सीख रहे हैं राजनीति। रवि किशन ने भोजपुरी में फैली अश्लीलता का सारा ज़िम्मा ख़ुद के अलावा बाकियों पर डाल दिया। हमको लगा कि नेहरू जी भोजपुरी इंडस्ट्री में नहीं थे, नहीं तो थोड़ी और आसानी हो जाती। माफ़ कीजिए, एक और सवाल — ये जो भी लोग दल बदलते हैं, वो एक ही दिन में कैसे उसी दल के विरोधी हो जाते हैं, जिनके लिए जान देने का वादा करते हैं? बहुत से सवाल हैं। आप पत्रकार वार्ता तो करेंगे नहीं, इसीलिए सोचा ख़त लिखूं। प्लीज़, इस बार ख़त लिखिएगा।

आपके जवाब के इंतज़ार में,
जिज्ञासु
सन्नी कुमार बोज़ो
बिहार से

Thursday, 23 October 2025

प्रिय प्रधानमंत्री जी!

प्रिय प्रधानमंत्री जी!

कोमल चरणों में सादर प्रणाम। हम सब यहां कुशल मंगल हैं। आशा है कि आप भी स्वस्थ और ख़ुश होंगे। मैं पहले कि दो पंक्तियां लिखनी ही पड़ती है इसीलिए लिख दिया। बहुत सी बातें हैं जो इस चिट्ठी में लिखना चाहता हूँ लेकिन दो बातों का डर है। पहला कि आपको ये चिट्ठी पढ़ने का समय मिलेगा या नहीं, आप देश विदेश के बहुत से मसलों में व्यस्त होंगे। दूसरा ये कि इस चिट्ठी को आपतक पहुंचने से पहले ही कोई अर्थ का अनर्थ न कर दे।

सुना है बिहार चुनाव में तो आप भी आयेंगे रैली के लिए। सीधे हवाई जहाज से उतरेंगे। हम कहते हैं आप खाली झूठे मुठे कह दीजिए कि आपका मन है बिहार के गांव गांव से होते हुए रैली के मंच तक पहुंचने का। भले ही आप सीधे आइए। आप सोचेंगे कि हम ऐसा काहे कह रहे हैं। आपको याद है एक बार और चिट्ठी लिखे थे, जब आप भोपाल आने वाले थे। उस समय एक ही दिन में भोपाल का सड़क चमकने लगा था। वैसा ही जादू हो जाएगा बिहार की गलियों में। वैसे ज़्यादा यूज तो होगा नहीं काहे कि गांव का नौजवान सब आपके अहमदाबाद सूरत में मजदूरी कर रहा है वहां का सड़क देखेगा।

आप रैली में थोड़ा समय निकालिएगा। आपसे सम्राट चौधरी जी के बारे में बात करनी है। प्रज्ञा ठाकुर और रेखा गुप्ता जी के बारे में भी बात करनी है। हमको लगता है आपके आसपास का लोग आपका फिरकी लेता है, आपको बताता नहीं होगा कि आपके नाम की मजबूती के कारण आपका नेता लोग कुछो बोलता है। देखिए आज ही सम्राट चौधरी जी बोले "RJD को टिकट नहीं मिला तो नाचने वाले को उतार दिया"। हमको मालूम है आप अभी ये पढ़कर तिलमिला उठे होंगे, सम्राट चौधरी जी को कॉल करके कहेंगे "कैसी बातें करते हो, कला को हे कि दृष्टि से देखते हो, नीचा दिखाते हो, हमारी संस्कृति का अपमान करते हो" 

अपमान से प्रज्ञा ठाकुर की याद आई। आपको पता है कैसे कैसे बयान देती हैं। इससे पहले आपको सफाई देनी पड़ी थी उनके बयान के लिए। अब फिर से अटपटे बयान जारी कर रखी हैं। हमको आप पर ही पूरा भरोसा है कि आप सीधे डांटेंगे उन्हें, क्योंकि भले ही आप देश के सबसे बड़े NGO (जैसा कि आपने 15 अगस्त को लाल किला से कहा था) के सदस्य रहे हों लेकिन आप इस देश की संविधान में भरोसा रखते हैं। यहां की एकता की बात करते हैं। एकता से याद आया दिल्ली में रेखा गुप्ता बहुत बढ़िया काम कर रही हैं, उन्होंने बताया कि पटाखे के कारण जो भी प्रदूषण हुआ है वो बाकी सालों से कम है। 

रेखा गुप्ता जी से बात हो तो पूछिएगा इस तरह का बयान देकर समस्या का समाधान हो जाएगा क्या। प्रधानमंत्री जी, हम यह सब नहीं पूछ सकते हमको बहुत डर लगता है सवाल करने में। एक आपसे ही उम्मीद है, आप सवाल करेंगे न तो काम भी हो जाएगा और कोई कुछ कहेगा नहीं। नहीं तो आजकल सवाल भी कहां कोई पूछने देता है। सवाल से याद आया आपने जो पेड़ लगाया था वो कैसा है अब? मोर खेलने आता है उधर?

सारे सवालों का जवाब मुमकिन न हो तो। मन के रेडियो में ही जवाब दीजियेगा। आपकी चिट्ठी के इंतज़ार में।

आपका 
सन्नी कुमार "बोज़ो"
भारत से 
23 अक्टूबर 2025

Monday, 14 April 2025

हिंसा तो हिंसा है -किसी के भी साथ हो, ग़लत है



उन दिनों मैं पुलिस अधिकारियों को फैसिलिटेट कर रहा था। विषय था: जेंडर बेस्ड वॉयलेंस एंड सेंसिटाइजेशन। हमारा फोकस महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने और यह समझने पर था कि पुलिस—जो न्याय की पहली सीढ़ी होती है—इसमें कैसे मदद कर सकती है।

हर वर्कशॉप की शुरुआत में, पहले ही घंटे में अक्सर अधिकारी कहते:
"आप लोगों को पुरुषों पर होने वाली हिंसा की ट्रेनिंग लेनी चाहिए। महिलाओं के बारे में तो होता ही रहता है। यह नया ज़माना है—अब महिलाओं पर अत्याचार नहीं होता, अब तो पुरुष पीड़ित हैं। लेकिन हमारी कोई सुनता ही नहीं है।"

तीन दिन बाद, उन्हीं के उठाए कई सवालों के जवाब वे खुद ही ढूंढ़ने लगते थे।
लेकिन वही existential crisis वाली बात सामने आती—कि यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा की घटनाएं बहुत ज़्यादा हैं, तो फिर खुद को भी बदलना पड़ेगा।
फिर भी, ट्रेनिंग के बाद हम कई सकारात्मक बदलाव और ज़रूरी बातचीत होते हुए देखते।

एक बार, मैंने साथ में फैसिलिटेट कर रहे एक साथी से पूछा था:
"जब हम महिलाओं पर होने वाली हिंसा की बात करते हैं, तभी पुरुषों पर होने वाली हिंसा की बात क्यों उठती है? यह बात पहले, बाद या समानांतर भी तो आ सकती है?"

उनका जवाब था:
"हिंसा तो हिंसा है—किसी के साथ भी हो, ग़लत है। लेकिन अक्सर लोग एक हिंसा के मुकाबले दूसरी हिंसा को इस तरह खड़ा कर देते हैं, मानो पहली हिंसा का कोई अस्तित्व ही न हो।"

हिंसा किसी के साथ भी हो, निंदनीय है।
हमें हर प्रकार की हिंसा को समझना और सहेजना चाहिए, लेकिन दो प्रकार की हिंसा को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने से न तो हिंसा खत्म होगी, न ही कम।

@बोज़ो 
13 अप्रैल 2025

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...