जब भी कोई मुझसे ये पूछता है कि गाँधीजी के किन विचारों को मानते हैं आप? तो घबरा जाता हूँ। क्या जवाब दूँ मैं। सत्य, अहिंसा, न्याय, सर्व धर्म सम्भाव ऐसे बहुत से शब्द ज़ुबान पर आते हैं और सामने वाले को गाँधीजी के प्रति मेरा लगाव ठीक ठीक पता हो आता है। दरअसल मैं इस प्रश्न से हमेशा भागना चाहता हूँ। क्योंकि मुझे मालूम नहीं कि मेरे अंदर ऐसे कौन एक आधा गुण भी है जो गाँधीजी के कहे हुए किन्हीं विचारों से मिलता जुलता है। फिर मुझे सबसे आसान लगता है अपने बचपन में दौड़कर भागना।
जहाँ दादी, माँ, पापा, भैया, मामा, मौसी सबके सब मुझे टुकड़ों टुकड़ों में जवाब देने लगते हैं। दादी ने हमेशा किसी को ग़लत करते देख लड़ी उनसे फिर भी मौक़ा पड़ने पर मदद के लिए तैयार रही (हालांकि मैं इतना स्वार्थी हूँ कि मैं किसी के लिए भी सही समय पड़ काम नहीं आता)... किसी को भी माफ़ करने का गुण माँ के पास जितना है उसका कुछ प्रतिशत भी मुझमें हो तो मैं बेहद ख़ूबसरत इंसान हो जाऊँगा। पापा ने दूसरों के लिए कभी बुरा न सोचना भरा है मुझमें,भईया ने उन्मुक्तता भरी है मुझमें समानता और जातिपात को तोड़ने को कभी नहीं कहा बस उनको देखकर अपने आप ही आ गया। मामा, मौसी से मुस्कुराहट सीखना अभी भी कम पड़ता है मुझे।
झूठ न बोलना, लोगों की मदद करना, ग़लत के लिए सवाल करना, प्रेम करना ये तो घर से ही सिखाया जाता है बच्चों को। हाँ, माँ ने किसी से भी लड़ाई झगड़ा न करना भी हमेशा कहती रहीं है। वो तो 2 अक्टूबर को छुट्टी होती थी, तो बापू के नाम याद हो आया, पैसे पर देखा तो बापू याद रहें। तब नहीं मालूम था कि कौन हैं गाँधीजी, हालांकि मुझे यह स्वीकार करते हुए झिझक नहीं है कि मैं अभी भी नहीं जानता उनके बारे में। हाँ, लेकिन अपने परिवार को तो जानता हूँ। हम अपने माँ को जानते हैं।
अब आख़िरी बात जिसे कहने के लिए ऊपर का ताना बाना बुना वह यह है कि हम भले ही किसी को मानो या न मानों। सभी महापुरुषों को भूलकर(बस मानने को कह रहा) इतना सोचिये हम अपने बच्चे को क्या सिखाना चाहते हैं। क्या बनाना चाहते हैं। अगर इसका ज़वाब एक "बेहतर इंसान" होगा तो हम सत्य, प्रेम, न्याय, भाईचारा, वसुधैव कुटुम्बकम को शामिल करेंगे ही करेंगे। तो बस इतना कहना है कि गांधी को नकारना है खुले मन से नकारिये। किसी को भी नकारना है नकारिये। लेकिन आप अपने आपको नहीं नकार सकते, आप परिवार को नहीं नकार सकतें, हम प्रेम को नहीं नकार सकतें।
देश में किसी भी विचारधारा के लिए आपके नफ़रत के प्रदर्शन से ज़्यादा ज़रूरी है हमारे घरों से बच्चों के लिए एक नई शुरुआत करना। उन्हें किसी भी महापुरुष का नाम नहीं पता, वो नहीं जानते हमारे अलावा किसी को, हम यानी परिवार ही दुनिया है उनकी। अब हमारी दुनिया में क्या क्या है हमें देखना होगा। सोचना होगा और काम करना होगा।
चित्र श्रेय-
Aneesh Thillenkery
bhaiya