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Tuesday, 21 December 2021

लौटना


लौटना!
जैसे लौटते हैं बच्चें
शाम ढले,
झाड़ते हैं कपड़े से धूल
छुपाते हैं दोस्तों से दी गईं खरोंचें
ढूंढ़ते हैं घर में ताक पर रखी आलपिन
टूटे हुए बटन के लिए,
"कल चिंटू को देख लूँगा" का ख़्वाब
चेहरे के पीछे कहीं गुस्से में रहता है रोता
पर हर बार रहती है घर लौटने की ख़ुशी

ऐसे ही लौटना,
जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था।

तुम जब भी लौटना,
एक बच्चे की तरह लौटना
सयाने होने के बाद भी...

@बोज़ो
21 दिसम्बर 2021

#poem #returning #bozokikalam #life #childhood

Friday, 17 December 2021

अलग-अलग

कभी कभी दो अलग चीजें अलग अलग जगह होती हैं और जब उनसे अलग अलग जगहों पर मिलते हैं तो लगता है जैसे उतनी अलग बातें नहीं हैं बस अलग रहने मात्र से ही जो अंतर आया है इससे लग रहा ये दो एक ही जैसी चीजें अलग अलग हैं। पर कितना सच है न जो अलग-अलग चीजें अलग-अलग रहकर भी एक जैसे, एक ही सकते हैं और कभी एक सी चीज़ें एक जगह पर भी अलग-अलग रहतीं हैं। इतनी अलग की पीठ और पेट के बीच जैसी दूरी हो जाती है। बाकी अभी सुबह के चार बजने वाले हैं और लैपटॉप पर यूट्यूब सजेशन में गाना चल पड़ा है....जाने तेरे शहर का क्या इरादा है, आसमान कम परिंदें ज़्यादा है...

#different #ishq #love #waiting #bozo #bozokikalam 

Wednesday, 29 September 2021

कविताएँ

जब भी शाम होती है,
हर किस्म की कविताएँ दौड़ते हुए आती हैं
जैसे पकड़म पकड़ाई खेलते हुए घर लौटते बच्चे।

कुछ हाफ़तें हुये कहती हैं 
हम यहाँ छुपे, यहाँ भागे
इसको हराया, इससे जीते
इससे प्रेम किया, उनसे डाँट खायी

कुछ पसीने से लथपथ
ज़ोर से साँस लेती रहती हैं
कह नहीं पाती किससे डरकर भागी है,
कौन पीछा कर रहा था।

कुछ यूँ देखती हैं जैसे कह रही हो
अच्छा हुआ शाम हो गयी
"कुछ देर और होती तो शायद हार जाती मैं"
कह नहीं पाती की किसी आंदोलन से होकर आयी है।

कुछ लौटते ही आँखें मूंदे सो जाती हैं
उनके खर्राटें की होती है एक अलग क़िस्म
कभी कभी बंध जाती है घिग्घी,
मानों सपने में ही किसी ने गला दबा दिया हो।

सपने में मर रही कविता को
जब भी बचाता हूँ, अपने अंदर पाता हूँ।


@बोज़ो

विरह

तुम बाढ़ हो सकती थी,
और मैं तुममें डूब चुका धान की फसल,
तुम रहते तो सब कहते मैं डूबा हूँ,
जाते हीं मेरी जगह नयी फसलें आती
और मैं भुला दिया जाता।

तुम अकाल हो सकती थी,
और मैं धरती में पड़ी दरारों में फँसी हुई एक आह, 
तुम्हारे रहते ज़िंदा रहता उम्मीदों की तरह

लेकिन,
मुझे यक़ीन है
तुम आग हो।
और मैं जंगलों से काटकर लाई गयी लकड़ी,
जिसे तुम शामिल करते हो ख़ुद में,
किसी ऑंगन में बनी मिट्टी के चूल्हें में,

तुम्हारे बाद मैं बचता हूँ सिर्फ़ ख़ाक
पर तुम्हारी तपन शामिल रहती है मुझमें
जबतक की मैं किसी खेत की फ़सल में शामिल न हो जाऊँ।

@बोज़ो

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