जैसे लौटते हैं बच्चें
शाम ढले,
झाड़ते हैं कपड़े से धूल
छुपाते हैं दोस्तों से दी गईं खरोंचें
ढूंढ़ते हैं घर में ताक पर रखी आलपिन
टूटे हुए बटन के लिए,
"कल चिंटू को देख लूँगा" का ख़्वाब
चेहरे के पीछे कहीं गुस्से में रहता है रोता
पर हर बार रहती है घर लौटने की ख़ुशी
ऐसे ही लौटना,
जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था।
तुम जब भी लौटना,
एक बच्चे की तरह लौटना
सयाने होने के बाद भी...
@बोज़ो
21 दिसम्बर 2021
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