Wednesday, 29 September 2021

विरह

तुम बाढ़ हो सकती थी,
और मैं तुममें डूब चुका धान की फसल,
तुम रहते तो सब कहते मैं डूबा हूँ,
जाते हीं मेरी जगह नयी फसलें आती
और मैं भुला दिया जाता।

तुम अकाल हो सकती थी,
और मैं धरती में पड़ी दरारों में फँसी हुई एक आह, 
तुम्हारे रहते ज़िंदा रहता उम्मीदों की तरह

लेकिन,
मुझे यक़ीन है
तुम आग हो।
और मैं जंगलों से काटकर लाई गयी लकड़ी,
जिसे तुम शामिल करते हो ख़ुद में,
किसी ऑंगन में बनी मिट्टी के चूल्हें में,

तुम्हारे बाद मैं बचता हूँ सिर्फ़ ख़ाक
पर तुम्हारी तपन शामिल रहती है मुझमें
जबतक की मैं किसी खेत की फ़सल में शामिल न हो जाऊँ।

@बोज़ो

#poem #virah #ishq #badh #biharflood #bihar #fire #poetry #shabdalay #shabdahaar #hindinaama #hindipnktiyaan #hindwi #writer #poetry #hindipoetry #bozokikalam

No comments:

Post a Comment

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...