इस किताब के बारे में मैं बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ। शुरू से लिखूँ तो भी इस किताब का अंत मेरे 'जेहन' में आने वाले 'अल्फाज' से चिपक गया है। खैर! बिन जाने भी एक अंत तो चिपका रहता है, उनके साथ भी जिनका कोई अंत नहीं। बहुत सी कहानियां कभी 'खत्म' नहीं होतीं। कभी टोपी शुक्ला कोई कहानी जी रहा होता है, कभी हम। कुछ कहानियां अपनी सूरत बदलकर आती हैं आखिर में मालूम पड़ता है अरे! ये तो वही कहानी है जो कल उसकी शक्ल में थी। कभी कभी कुछ कहानियां पुनर्जन्म लेती हैं। "राही मासूम रजा" की ये किताब कईं सारी कहानियों का पुनर्जन्म है।
जबकि मैं इस क़िताब का अंत भी शुरुआत से साथ लिए हुआ हूँ फिर भी आपको उसकी भनक नहीं लगने दूँगा। लेखक ने इतने ही खूबसूरत तरीके से "टोपी शुक्ला यानी पण्डित बलभद्र नारायण शुक्ला" की कहानी लिखी है, सबकुछ शुरू में बतलाने के बाद भी आपको अंत की भनक नहीं लगेगी। वैसे कहानी तो टोपी के जन्म से ही करेंगे। जन्म की सामाजिक सच्चाई को कहते हुए राही साहब ने लिखा है;
"संसार के तमाम छोटे-बड़े लोगों की तरह टोपी भी बेनाम पैदा हुआ था। नाम की जरूरत तो मरनेवालों को होती है। गांधी भी बेनाम पैदा हुए थे गोडसे भी। जन्म लेने के लिए आज तक किसी को नाम की जरूरत नहीं पड़ी है। पैदा तो केवल बच्चे होते हैं। मरते मरते वह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, नास्तिक, हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, गोरे, काले जाने क्या क्या हो जाते हैं।"
टोपी शुक्ला का जन्म पिता डॉक्टर भृगु नारायण शुक्ला नीले तेलवाले और माता रामदुलारी दादी सुभद्रदेवी आगे पीछे दो भाइयों के पीठ के बीच में हुआ। वैसे ये सब चुनना तो टोपी के नसीब में नहीं था नहीं तो टोपी तो चाहता था कि उसके पीठ पर जन्में भाई के बदले एक साइकिल हो जाता तो ठीक था। वैसे जब आप इस कहानी में दाखिल होंगे तब टोपी का दोस्त इफ्फन उसकी बीवी सकीना से भी मिलेंगे।
बनारस से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कैम्पस और बचे सफर पर आप इस किताब के साथ जाएं। वैसे किताब के कुछ हिस्से हमेशा के लिए रह गए हैं;
"लाश!
यह शब्द कितना घिनौना है! आदमी अपनी मौत से, अपने घर से, अपने बाल-बच्चों के सामने मरता है तब भी आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं और आदमी सड़क पर किसी बलवाई के हाथों मारा जाता है, तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं। भाषा कितनी गरीब होती है! शब्दों का कैसा जबरदस्त काल है! कितनी शर्म की बात है कि हम घर पर मरनेवाले और बलवे में मारे जानेवाले में फर्क नहीं कर सकते जबकि घर पर केवल एक आदमी मरता है और बलवाइयों के हाथों परम्परा मरती है, सभ्यता मरती है, इतिहास मरता है। कबीर की राम की बहुरिया मरती है। जायसी की पद्मावती मरती है। कुतुबन की मृगावती मरती है, सुर की राधा मरती है। वारिस की हीर मरती है। तुलसी के राम मरते हैं। अनीस के हुसैन मरते हैं। कोई लाश के इस अम्बार को नहीं देखता। हम लाशें गिनते हैं। सात आदमी मरे। चौदह दुकानें लूटीं। दस घर में आग लगा दी गई। जैसे कि घर, दुकान, और आदमी केवल शब्द हैं जिन्हें शब्दकोशों से निकालकर वातावरण में मँडराने के लिए छोड़ दिया गया हो..."
वैसे मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ कि नौकरी के लिए कोई राजनीतिक टिप्पणी करूँ, हाँ राही साहब ने जो बात कहीं है उससे आपका भी कलेजा निकल ही आएगा;
नौकरी!
सुना जाता है कि पहले जमानों में नौजवान, मुल्क जीतने, लम्बी और कठिन यात्राएँ करने, खानदान का नाम ऊँचा करने के ख्वाब देखा करते थे। अब वे केवल नौकरी का ख्वाब देखते हैं। नौकरी ही हमारे युग का सबसे बड़ा एडवेंचर है! आज फाहियान और इब्ने-बतूता, बास्कोडिगामा और स्काट नौकरी की खोज में लगे रहते हैं। आज के ईसा, मोहम्मद और राम की मंजिल नौकरी ही है।
वैसे आप समझ गए होंगे कि टोपी शुक्ला की कहानी में भी नौकरी की बात भी होगी। वैसे बहुत से किरदार चाहते हैं कि मैं उनका नाम यहीं ले लूँ। लेकिन कहानी के हिसाब से ही आप उनसे मिले तो बेहतर होगा। वैसे एक बात चलते चलते कह दूँ अगर सकीना मेरा लिखा अभी पढ़ रही होती तो लड़ बैठती जैसा वो टोपी से लड़ती है। आप कहानी पढ़े तबतक मैं सकीना से बचने के लिए अपने कुछ शब्दों को ठीक से लिख देता हूँ।
रज़ा।। ज़ेहन।। अल्फ़ाज़।। ख़त्म ।। इफ़्फ़न।। दाख़िल।। सफ़र।। क़िताब।। ग़रीब।। ज़बरदस्त।। फ़र्क।। ज़मानों।। ख़्वाब।।फ़ाहियान।। मंज़िल।।
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@बोज़ो
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