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Saturday, 18 September 2021

एक चिथड़ा सुख



किताब - एक चिथड़ा सुख
लेखक -निर्मल वर्मा
..............................................................किताब का नाम "एक चिथड़ा सुख" पढ़ते से ही ऐसा लगता है मानों हृदय में सवालों के पेड़ उग आए हों। सुख? चिथड़ा? एक चिथड़ा सुख? ये सुख है भी तो चिथड़ा क्यों है? सुख का अर्थ तो सम्पूर्णता की ओर इंगित करता है, फिर ये किस सुख की बात है?

जब तक कि इन सवालों के पेड़ बिना जवाब के पतझड़ में बदलने लगते हैं आप पढ़ते हैं किताब के मुख्य कवर के पिछले हिस्से पर लिखा एक संवाद-

-तुमनें कभी उसे देखा है
-किसे?
-दुख को... मैंने भी नहीं देखा लेकिन जब तुम्हारी कज़िन यहाँ आती है मैं उसे छिप कर देखती हूँ। वह यहाँ आकर अकेली बैठ जाती है। पता नहीं क्या सोचती है और तब मुझे लगता है, शायद यह दुख है!

तब यकायक लगता है मानों एक जवाब मिलते ही सवालों का एक पेड़ फिर से उग रहा हो। क्या सचमुच में दुख की आकृति, रूप रेखा कैसी होगी?

बिट्टी, इरा, डैरी, डैरी की बहन, नित्ति भाई, और बिट्टी का कज़िन इन सबके जीवन के अपने सवालों के जवाब उम्र के किसी पतझड़ की ताक में हैं। दिल्ली की सड़कों पर न जाने कितने सवालों ने अपने रंग बदल लिए हो मानों एक पत्ता इंद्रधनुष सा पनप गया हो। 

बिट्टी की बरसाती, डैरी का घर, नित्ति भाई का कमरा, निज़ामुद्दीन स्टेशन, बिहार का जंगल और इलाहाबाद सबकुछ अपने में रखें हैं। किसी का सच, किसी का डर, किसी का इंतज़ार, किसी का बचपन, किसी की जवानी, किसी की ज़िन्दगी और शायद किसी की मौत भी। 

किरदारों के बीच के संवाद हर समय सवालों के नये बसंत के साथ साथ हमेशा एक पतझड़ लिए हुए है। 
इस किताब के कुछ अंश नीचे लिख रहा हूँ।

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¶कुछ लोग अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखाई देते हैं-उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

¶शायद वे लोग जो शुरू की ज़िन्दगी में बहुत नीचे जाते हैं, वे ऊपर आकर उदासीन हो जाते हैं।

¶कुछ लोग इतने सम्पूर्ण ढंग से अधूरे होते हैं कि अपना अधूरापन पोंगा-सा जान पड़ता है।

¶कुछ लोगों के भीतर झाड़ियाँ उगने लगती है और उनका दिल धीरे धीरे दुनिया से डरकर झाड़ियों में दुबक जाता है, वहीं छिपा रहता है।

¶बीती हुई स्मृति आनेवाली पीड़ा को कभी माफ़ नहीं करती।

देखते हुए हम जो भूल जाते हैं, लिखते हुए वह एक 
बार फिर याद आ जाता है।

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ज़िदगीं भर एक सुख की कामना और उसे पाने की यात्रा निरतंर चलती रहती है। ऐसी न जाने कितनी यात्राएँ हम किसी किताब, डायरी के साथ पूरा करते हैं। ख़त्म होने के बाद भी। कभी कभी किसी पन्ने से यादें टपकने लगती हैं। एक एक बूंद कभी कभार मृत्यु के अनकहे बाढ़ में तब्दील होकर हमें कहते हैं। तुम अबतक ज़िंदा कैसे हो? 

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