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Wednesday, 1 September 2021

हमारा मुखिया कैसा हो?

चलिए! आज आपको एक दुकान में लिए चलता हूँ। कपड़े की दुकान में। पहुँचते ही दुकानदार आपसे पूछता है,
क्या चाहिए? और आपको चाहिए होता है जींस। और आपके जींस कहते ही आगे की बातचीत शुरू होती है।

जिंस के वरायटी में सबसे पहले दुकानदार पूछता है; प्लेन या डिज़ाइन? अगर आपने कहा दिया डिज़ाइन तो सबसे पहले उसका कहना होता है कितना तक चलेगा, डिज़ाइन का रेट थोड़ा हाई है। ये पूछते ही लगता है जैसे दुकानदार कह रहा ज़्यादा अच्छा कपड़ा पहनने की हैसियत है कि नहीं एक बार देख लो क्योंकि महंगी है। अब बात जब भी हैसियत की हो मानवीय गुण कहता है कि मानवीय मन "सामने वाले से हैसियत बड़ी है मेरी" का भरम पैदा करता है। और आप फिर कह देते है अरे आप दिखाओ। 


वो आपको प्लेन जींस के फायदे बताता है और टिकाऊ होने का विश्वास भी दिलाता है। आप पूछते हैं डिस्कलर होगा तो वापस करेंगे जीन्स? वो आपको सारे वादें और फ़ायदे की बातचीत में बता चुका होता है कि वापस तो नहीं होगी जींस। कभी कभी अगर ट्रायल रूम हो और आपने जींस पहनकर देख लिया तो फिटिंग का पता चल जाता है। लेकिन यदि आप हैं जो जींस पहनकर देखना घर पर पसंद करते हैं तो ट्रायल कर ही नहीं पाते। आप दुकानदार की बातों पर भरोसा करते हुए घर लौटते हैं। अगर दुकान के बाहर "बिका हुआ माल वापस नहीं होगा" का बोर्ड लगा हुआ है तो आप अपना जींस ध्यान रखकर ही ख़रीदते हैं कि दुकान से निकलने बाद कैसे भी करके जींस से काम चलाना पड़ेगा।

अब हो सकता है कि आपके पास यही एक जींस है जिसे आपको पाँच साल चलाना है तो क्या करेंगे आप? 

अब पाँच साल सुनते ही आपके मन में बिहार में होने वाला पंचायत चुनाव का ख़याल आ गया होगा। 24 सितम्बर से लेकर 12 दिसम्बर तक 11 चरणों में होने वाले पंचायत चुनाव का बिगुल तो बज चुका है। और अब आपके कानों में बहुत से नेताओं के नये नये उभरते नेताओं की मीठी मीठी आवाज़ कानों में शहद घोल रही होगी। वैसे बिहार में 16 जिला बाढ़ का कहर झेल रहा है 34 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। उनके लिए चुनाव के चरण इस तरह रखे गये हैं कि तबतक बाढ़ की हालत ठीक हो जायेगी। अभी तो गंगा मईया और बूढ़ी गंडक हमसें नाराज़ ही है। 


पूरे बिहार में पंचायत चुनाव के तहत कुल छह पदों मुखिया के 8072, वार्ड सदस्य के 1,13,307, पंचायत समिति सदस्य के 11,104, जिला परिषद सदस्य के 1160, पंच के 1,13,307 व सरपंच के 8072 पदों के लिए चुनाव होगा। 

याद कीजिये कि पिछले चुनाव में जो मुखिया, चुनाव लड़ने के लिये प्रत्याशी हुए थे वे कैसे दुकानदार थे। किस तरह का जींस आपको बेचा उन्होंने। रंग बदला की नहीं? फिट हुआ कि नहीं? वादे के मुताबिक़ चल रहा है या आप बस इंतिज़ार में हैं कि हालत ही तो नया जींस ख़रीद लें। वैसे अभी न थोड़ा बहुत ट्रायल तो सभी प्रत्यासी दे ही रहें हैं।

बात ये है कि जींस की दुकान से आप जींस नहीं खरीदेंगे फिर कोई दूसरा ग्राहक आकर खरीदारी तो करेगा ही। और ये तो चुनाव की दुकान है, हर दुकानदार अपनी क़्वालिटी बताकर बेचता ही रहेगा। तो थोड़ा सा समझिए कि आपको वादे के मुताबिक़ और ज़रूरत के हिसाब से अच्छी फ़ीट एंड फाइन जींस ख़रीदनी है। 

मुखिया पंचायत का एक अहम हिस्सा है। आईए जानते हैं क्या है मुखिया की जिम्मेदारियां -

मुखिया की ज़िम्मेदारियां-

1) ग्राम सभा और ग्राम पंचायत की बैठकें आयोजित करना और उनकी अध्यक्षता करना। एक कैलेंडर वर्ष में कम से कम चार बैठकें आयोजित करना।
2) बैठकों का कार्य-व्यवहार संभालना और उनमें अनुशासन कायम रखना।
3) पूंजी कोष पर विशेष नजर रखना
4) ग्राम पंचायत के कार्यकारी प्रशासन की देख-रेख
5) ग्राम पंचायत में कार्यरत कर्मचारियों की देख-रेख और दिशा निर्देश देना।
7) ग्राम पंचायत की कार्य योजनाओं/प्रस्तावों को लागू करना।
8) नियमानुसार रखी गई विभिन्न रजिस्टरों के रख-रखाव का इंतजाम करना।
9) ग्राम पंचायत के तय किए चंदों, फीसों और टैक्सों की वसूली का इंतजाम।
10) विभिन्न निर्माण कार्यों को कार्यान्वित करने का इंतजाम करना।
11) राज्य सरकार या एक्ट अथवा किसी अन्य कानून के अनुसार सौंपी गई अन्य जिम्मेदारियों और कार्यों को पूरा करना।


मुखिया की ये ज़िम्मेदारियां आपको मालूम होने चाहिए। तभी तो आप जान पायेंगे कौन सी ज़िम्मेदारी निभाई नहीं गयी पहले और कौन सी निभाई जानी चाहिए थी। आपके जीवन में अक्सर ऐसा समय आता है जब बहुत में से एक चुनना होता है। तो याद रहे कि आपकी भी ज़िम्मेदारियां और कर्तव्य क्या हैं। याद रहे आप पाँच साल फिर ये जींस बदल नहीं पायेंगे।

बाक़ी आपको कैसा जींस चाहिए ये बात आपसे बेहतर कोई और नहीं बता सकता। दुकानदार भी नहीं। 


Saturday, 28 August 2021

डूबता सूरज

 इससे पहले काविश को इतने ध्यान से नहीं सुना था।  रात के 1 बजने को है। बिन मतलब बस लिखने को लिखना शुरू किया है। कितना अज़ीब है हर बात में मतलब ढूंढ़ना भी तो ठीक नहीं। जैसे रिश्तों में। जैसे बच्चों की हसीं में। जैसे किसी को बिन कुछ कहे देखने में। जैसे इस तस्वीर में डूबते हुए सूरज का मतलब क्या है। इतनी रात गये जगने का मतलब। बाढ़ के आने का मतलब। आसमां के बादलों का पानी में दिखने का मतलब। हर लिखे में तुम्हारा ख़याल आने का मतलब।


ऐसा नहीं लगता जैसे कभी कभी बिन सवाल किये भी साँसें चलती रहनी चाहिये। भले ही इंसान ज़िंदा न हो कम से कम ज़िंदा होने का भरम तो लगा रहे। ऐसे मुझे अभी नहीं पता कि काविश का दूसरा गाना "तेरे प्यार में" भी खूबसूरत लग रहा है। 


गाँव के निचले हिस्से में जिनका घर है उनके घरों में पानी आ चुका है। मैं सोचता हूँ ये पानी हर आकार में ढल सकते हैं तो ऐसा क्यों नहीं करते कि सिर्फ़ वही रास्ता लेते जो एक खूबसूरत दृश्य बनाता हमेशा। फिर मैं सोचता हूँ ये आंखों का पानी भी तो भीतर की ओर हृदय तक बहता होगा और उसका परावर्तित अंश बाहर गालों से होते हुए हवाओं में सुख जाता है। पर अंदर की ओर बहने वाले उस पानी तक तो कोई सूरज की रोशनी नहीं पहुँचती। 


 बाहर का पानी हवाओं के स्पर्श से भी सुख जाता है और अंदर तक रोशनी भी मयस्सर नहीं। जिन घरों में पानी हैं वो बाढ़ के ख़तम होने के इंतिज़ार में कुछ महीने गुज़ार ही लेंगे। खेतों में आया बाढ़ पूरा का पूरा आईना बन चमकता है। दिन में आसमां भी उतर आता है नीचे। कभी कभी कुछ बादल कुछ बची हुई फसलों को देख तन्हा नहीं रहने देती, बरस जाता हैं। शायद बादलों को पता है अकेले ज़िंदा रहना अकेले मर जाने से भी भयानक है। 



पिछली शाम जब ये डूबता सूरज दिख रहा था लगा सिर्फ़ सूरज डूबता रहता तो इतना अज़ीब नहीं लगना था। सूरज के डूबने के साथ पूरी रात के लिए डूब जाते हैं पेड़ों के पत्तो की हरियाली, चिड़ियों की उड़ान, बच्चों के खेल और लगता है मानों रात भर इन डूबे हुए हरियाली, उड़ान और खेल से कोई गीत गा रहा हो।


अभी काविश का गाना बदल कर मैंने बंदिश बैंडिट का "विरह" लगा दिया है।

Wednesday, 8 July 2020

बिहार चुनाव 2020

प्रिय बिहार!
पता तो होगा ही की चुनाव आने वाला है। खुशी की बात ये है कि अभी रैली करना मना है तो ट्राफ़िक जाम की दिक़्क़त नहीं होगी। एलसीडी की व्यवस्था तो आराम से हो रही है। फेसबुक, इंस्टा, ट्विटर पर लाइक और शेयर से सभी पार्टी और नेता अपना शक्ति प्रदर्शन करना शुरू हो चुका है। पार्टी प्रदर्शन तो राजाओं के समय से ही चला आ रहा है। सबसे पहले लोकतंत्र भी तो आप ही की देन है। 

पता है जब देश के किसी दूसरे राज्य में होता हूँ तो अपने यहाँ से कुछ लोग मिलते हैं तो बिहार का गुणगान शुरू हो जाता है। पहला लोकतंत्र, पहले राष्ट्रपति, नालन्दा विश्वविद्यालय, मगध, अशोका, बुद्ध, महावीर का कुंडग्राम, जेपी का छात्र आंदोलन एक लंबी फेहरिस्त जिसे सुनकर कोई भी अभिभूत हो जाए कि सही में कितना ऐतिहासिक है बिहार की भूमि। यह सुनकर हम सभी का दिल खुश हो जाता है। मगर आप ध्यान से देखो इससे पहली वाली पंक्ति में "ऐतिहासिक" लिखा है।

वर्तमान??? इसके बारे में क्या कहेंगे???

■सबसे पहली बात "शराबबंदी" की कर लें तो अच्छा रहेगा। जब यह ऐलान हुआ की शराबबंदी होनी है। तो अलग ही माहौल हुआ। मतलब कहे तो एकदम हड़कम्प मच गया। जितने लोगों के पास पैसे थे उस समय सभी ने जितनी बोतलें हो सकी ख़रीद कर रख लिया। शराब पीकर शराबबंदी का ग़म मनाने लगे लोग। होली में भी सूखा ही रहेगा कैसे होगा विवाह शादी फंक्शन में शराब की पार्टी।

■दूसरी तरफ़ पूरे बिहार में वो घर चुपके से खुशी मना रहे थे जिनके घर में लोग पीकर घरेलू हिंसा करते हैं। 
लेकिन....शराबबंदी के इतने सालों में क्या हुआ? कितना सफ़ल रहा? इस पर चर्चा होना चाहिए। कुछ दिन पहले बिहार के एक स्थानीय समाचार में करोड़ों रुपये का शराब बरामद किया गया। जिसमें उस गाँव के मुखिया के शामिल होने की भी पुष्टि हुई।(आप सभी दैनिक भास्कर के मुज़फ़्फ़रपुर एडिशन में यह समाचार देख सकते हैं अप्रैल के महीने में, मैं डेट बता दूंगा) 
यह तो बात सिर्फ़ एक जगह की है बिहार में, हालत ये है कि महंगी कीमत पर चोरी से शराब उपलब्ध हो जाती है। 

¶(शराब पीना सही और ग़लत की बात मैं नहीं करूँगा इतना सयाना नहीं हुआ हूँ कि कुछ कहूँ सिर्फ़ आपको आज के वर्तमान का बता रहा हूँ, हाँ बात और है कि "सच" सबको पसन्द आये ज़रूरी नहीं)
◆◆◆ अभी नशे के अलग अलग विकल्प ढूंढ चुके हैं बच्चे (बच्चे से तात्पर्य 13 साल तक के बच्चे)

अभी के लिए बस इतना ही कहूँगा, इसके लिए सिर्फ़ राजनीति ज़िम्मेदार नहीं है। आप और हम पूरा बिहार शामिल है इसमें। स्थानीय स्तर पर हम और आप ही होते हैं जो अंतिम व्यक्ति है। लेकिन हम हमेशा यह सोचकर चुप रह जाते हैं की सामने वाला आख़िरी व्यक्ति है। हमारा काम हो गया तो सब ठीक।

दोस्त,चाची, चचा, बाबा, दादी (जो स्थानीय स्तर पर राजनीति, विधि व्यवस्था और न्यायव्यवस्था में शामिल हैं) आप अपने परिवार को भेज देंगे बाहर भगवान करें आप सक्षम हो लेकिन आप की थोड़ी सी दरियादिली से बाकी समाज का भी भला होगा।

दोस्त,चाची, चचा, बाबा, दादी (जो अपने घरों के करता धरता हैं) कोई नहीं आने वाला जादू कर के सब ठीक करने। आप ख़ुद से कम से कम शुरू करो।

◆क्या शुरू करोगे? 
सोचना और समझना शुरू करो। कि आपके आसपास हो रही समस्याओं पर कम से कम बात करना कैसे शुरू किया जाए। तभी तो काम शुरू होगा बदलाव के लिए।

बाकी नीतीश चचा ने अच्छी कोशिश की है, उससे पहले लालू चचा ने भी अच्छी कोशिश की है, उनसे पहले वाले चचा ने भी अच्छी कोशिश की है। अब हम सब को सामाजिक स्तर भी अच्छी कोशिश करनी है। (क्या क्या कोशिशें हो सकती हैं अगले ख़त में लिखूँगा)

◆इस चुनाव में रखना ध्यान◆
◆कैसे बढ़ेगा बिहार का मान◆

बदलाव की कोशिश में
एक बिहारी
🙏🙏🙏

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प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...