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Friday, 10 December 2021

आम शादियों ने लिखी प्रधानमंत्री जी को चिट्ठी

डिअर प्रधानमंत्री जी!

कोमल चरणों में हम "आम शादी बिरादरी" का सादर प्रणाम स्वीकार कीजिये। हम सब कुशल नहीं हैं और नहीं हमारे होने से कुछ भी मंगल है। तो इधर का बहुत कुछ आपसे बतियाना है। आप स्वस्थ्य तन्दरुस्त और पहले से बेहतर हो यहीं कामना है। 

देखिए! आपको भी पता है शादियों का सीज़न अपने चरम सीमा पर है। जिधर देखिए फेसबुक व्हाट्सएप पर शादियां ही शादियां चल रही हैं लेकिन हमें अपने बिरादरी के शादियों से हमदर्दी है। चाहे आम शादियों में कितनी ही शिकायतें हों। दहेज़ के लिए लड़की वाले का ज़मीन बिक गया हो या 5 लाख का कर्ज़ हो गया हो। बाराती में डांस करने के लिए गौआँ (Vilagers) और बाराती के बीच मार हो गया हो। या फिर दूल्हे के जीजा अपने टाइम का बाक़ी दहेज़ के लिए नखरा करके नाराज़ हो गए हों। या की बड़की भौजी बीयूटी पार्लर न जा पाने के लिए नाराज़ हो। या की 200 की जगह 300 बाराती पहुँच जाने की वज़ह से खाना कम जाने की समस्या हो। मंडप पर लड़का पक्ष से मनचाहा गहना न चढ़ाया गया हो। इंजीनियर लड़का के नाम पर राशन की दुकान चलाने वाले लड़के से शादी हो रही हो। ये सारी शादियां हमारी बिरादरी के हैं "आम शादियां"।

आपने भी रामानंद सागर कृत "रामायण" देखा होगा। उसमें श्रीराम जी ने कितने सुंदर तरीक़े से बाण पर प्रत्यंचा चढ़ाया और बाण टूट गया। श्रीराम और माता सीता की शादी हुई। ये सदियों पहले की बात है इसीलिए थोड़ी सी भी ग़लती हो हमसें तो हमें क्षमा कर दें। श्रीरामचंद्र जी और माता सीता की शादी आम शादियों में से एक नहीं थी। सदियों से हम शादियों को उस शादी को प्रेरणा मानकर सफ़ल होने की प्रार्थना की जाती है। इनदिनों ऐसी शादियां तो कल्पना में ख़ुश रहने के लिए है। देखिए न अब तो त्रेता युग है नहीं कलयुग हैं। हर घर है रावण बैठा इतने राम कहाँ से लाऊँ वाली बात है। 

    हर बच्चा जिसे पढ़ने के लिए संसाधन उपलब्ध है वो अपनी पूरी ज़िंदगी अच्छे से पढ़ाई करने में गुज़ार रहा कि नौकरी मिल जाये। तो शादी की योग्यता पूरी हो। पहले हम आम शादियां भी काफ़ी ख़ुश रहती थीं। सरकारी नौकरी वाली शादियों में हमारा रुतबा रहता था। पर जब से प्राइवेटाईज़ेशन ज़ोरो शोरों से बढ़ रहा है बड़ा डर लगा रहता है। ऊपर से तो 2018 में हुए एग्जाम के रिजल्ट अभी भी पेंडिंग में हैं। बच्चे लुसेंट की किताबें लेकर सोते जागते हमारा सपना देखते हैं। बहुत से बच्चे जो सरकारी नौकरी करके शादी करके किसी के साथ घर बसाने का सपना लिए थे उनमें से बहुत से बच्चे प्रेमिका के बच्चे को 200 रुपये महीने ट्यूशन फ़ी लेकर पढ़ा रहे हैं। उन्हें अभी भी अपनी पूर्व प्रेमिका की बात पर यक़ीन है "हमसे बेहतर लड़की मिलेगी तुम्हें", ज़िस्म भले ही दूर है पर रूह हमेशा से तुम्हारा है। 
    
    फ़ॉर्म भरने के लिए बेरोज़गार बच्चे अगल बगल से कर्ज़े ले रहें हैं। कहीं एग्जाम सेंटर दूर हो गया तो बाइक से जाने का सोचते हैं लेकिन पेट्रोल का दाम  देखकर रोने लगते हैं। उनको रोता देखकर हमें विदाई में फूट फूट कर रोती हुई माएँ याद आती हैं। हमारा मन करता है कि हम होने ही नहीं चाहिए थे। इतना दुःख होता है। हम सबको लगता है महँगाई भी जब ऐसे बच्चों को रोते देखती होगी तो कालेज़ा फट जाता होगा।

  माफ़ कीजिये! पता नहीं अभी बहुत भावुक हो गयें हैं हम सभी। क्या बताने के लिए आये थे और क्या कह रहें हैं। ख़ैर! आप ऊपर के बेरोज़गारी, प्राइवेटाईज़ेशन, महँगाई पर बिल्कुल भी ध्यान मत दीजिये। पिछले 70 साल पर इसकी ज़िम्मेदारी डाल दीजिए। जैसे कुछ स्पेशल शादियों का बोझ हम आम शादियों पर आ जाता है। कोरोना के आने से जब पहली बार लॉकडाउन लगा तब हमें काफ़ी स्पेशल फ़ील कराया गया। हम आम शादी बिरादरी में भी सब स्पेशल लगने लगा था। सिर्फ़ 50 लोग। मास्क के साथ। डीजे नहीं।  हमें तब उन सभी लड़की पक्ष के लिए अच्छा लगा जिन्हें नॉर्मल दिनों में 5 लाख कर्ज़ लेने पड़ते। कोरोनकाल में हमारे अस्तिव से हमनें कईं पुस्तों को क़र्ज़ के चुंगल में जाने से बचते देखा। जो सक्षम लोग थे उन्होंने पुलिस वालों को भी बुलाया 200 और लोगों के साथ। अब कहाँ तक ही बताएँ। हम आम शादी हैं इंवेशटिंग ऑफिसर थोड़े न हैं।


   अभी सदियों से हमारे बिरादरी में थोड़ा बहुत नयापन आकर हमें इवॉल्व करता रहा है। कोरोना काल की आपदा में बहुत से लोगों के लिए हम अवसर बनें। उस वक़्त बहुत से कम लोगों ने फ़ोटो खिंचाया और पोस्ट किया दोस्तो को कम टैग किया कि कहीं 50 लोगों में शामिल न होने के कारण उन्हें दुःख न हो। हमें उस बात का दुःख नहीं है। हमें उतना दुःख नहीं कि बहुत से लोगों की शादियों में पहले प्रेमी ने आकर "जा सजना तुझको भूला दिया" गाया। हमकों इस बात का भी दुःख नहीं कि हमें हर बार समाज अपने हिसाब से यूज़ करे। 

प्रधानमंत्री जी!
हमें बहुत रोना इस बात का आ रहा है कि कैटरीना और विकी कौशल की शादी हम आम शादी से बहुत अलग हो रहा है। बात अलग होने तक का नहीं है। हर बिरादरी में उप बिरादरी होती है नयी बात नहीं है। लेकिन बहुत बुरा लग रहा कि सब कोई कॉमन फोटों ही शेयर कर रहा। सब सलमान ख़ान का मीम बना रहा। रणवीर कपूर की बात कर रहे हैं। ये वहीं लोग हैं जो हम आम शादियों से पहले लड़कियों को प्रेम क्यों कि के नाम पर कूटते हैं, प्रेमी को लापता कर देतें हैं। जिससे शादी होती है उस वर के सामने लड़की ने कभी किसी लड़के से बात की होगी जैसी बात दूर दूर तक नहीं लाते। लड़के का किसी से प्रेम था का ज़िक्र नहीं करते। ये सब लोग सलमान ख़ान का तेरे नाम वाला फ़ोटो शेयर कर रहे हैं। हमकों इस बात का भी कम दुःख है। हम आम शादियों में लोग मुश्किल से वीडियो कैमरा बुक करते हैं और कैसेट बनने का पैसा देते हैं। एक टाइम डिसाइड करके पूरी फैमिली के साथ देखते हैं। लेकिन ई वाले शादी में वीडियो का पैसा भी देखने वाले लोग भरेंगे। ई तो हम आम शादियों से बहुत बड़ा भेदभाव है। 

प्रधानमंत्री जी!
हम आम शादियों के साथ होने वाले इस भेदभाव को थोड़ा सा कम कीजिये। कम से कम जो लोग नहीं जा पाएं शादी में उनके लिए वीडियो तो मुफ़्त में मिले। 

भेदभाव मुक्त शादियों के उम्मीद में,
 "आम शादी बिरादरी"

Saturday, 20 November 2021

शराब की बोतलों ने लिखी प्रधानमंत्री को चिट्ठी

डियर 
प्रधानमंत्री जी!

     हम बिहार में "शराब की बोतलें" आपसे बहुत उम्मीद लगाये हुए हैं। हमारे साथ ये भेदभाव मत होने दीजिए। पहले सब को बराबर उपलब्ध होते थे तो कोई भी ख़रीद लेता था। ऐसा नहीं था कि सिर्फ़ पैसे वाले या पावर वाले लोग खरीदें हमकों। हमकों बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ऐसे। हमसें भी तो कंसेंट लिया जाए। पहले जिनके पास पैसे नहीं होते थे वो अपने दिन की मज़दूरी का हिस्सा हमारे नाम करते थे। उनसा प्यार हमें सबसे मिलता था। हाँ, हम बोतलों में भरी शराब के ख़तम होने का दुष्प्रभाव हम कभी नहीं चाहते। जब भी हमारे ख़ाली होने पर कोई अपनी पत्नी को पिटता है तो सच मानिए जी करता हैं जहाँ रखें हैं वहीं से उड़ के जाए और सरपर जोड़ से लग जाये उस इंसान के। और अपने सारे बोतल समाज में उस इंसान की ख़बर पहुंचा दें कि इस इंसान के हाथ कभी न लगना। चाहे उनके पास पावर हो या न हो। कोई पुलिस हो या नेता या कोई व्यापारी ऐसे किसी इंसान के हाथ नहीं लगना हमें जो हमारे बिना कंसेंट के अपने पॉवर का धौंस जमाये।

    शराबबंदी के बाद से हम बोतलों को बहुत ही हे कि नज़र से देखा जाने लगा। छूपाने लगें लोग। ऐसे आज़ादी की बात करें तो कंगना जी की बात सही ग़लत है नहीं कहना उसपर लेकिन हमारी आज़ादी पूरी छीन गयी। बात ऐसी भी नहीं है कि हम आज़ादी चाहते हैं कि हर कोई हमारे साथ दिन रात रहने का पागलपन कर बैठे। पर हमें भी आज़ादी चाहिए। पहले दिन दहाड़े निकलते थे। अब कभी शर्ट में, कभी थम्स अप के बोतल में, कभी दवा के डब्बे में, कभी गाड़ी की डिक्की में, हमें आज़ादी चाहिए ऐसे व्यहवार से जो हमें छुपाने के लिए न जाने कौन से पॉकेट में रख लेते हैं।

      हम बोतलें ट्रक के ट्रक एक साथ पकड़ें गयें। हम बोतलें दूसरे राज्य से आते हुए पकड़े गयें। हम बोतलें गाड़ी की डिक्की में भी पकड़ें गए। हम बोतलें सुनसान खेतों के बीच ख़ुफ़िया जगह पर पकड़ें गयें। हम बोतलें लंडन ठुमकता डांस देखते समय भी धर लिए गए बाराती में। बहुत बार कहने का मन हुआ "ग़ज़ब बेइज्जती है।" लेकिन अब क्या करें हमलोग। हमलोगों को जितना इज़्ज़त पुराने शायरों ने दिया अब नहीं मिल रहा। .
ग़ालिब हमारे लिये लड़े, उन्होंने कहा:"शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता जहाँ ख़ुदा नहीं।" वसी साहब ने लड़ा कहा "खुदा तो मौजूद दुनिया में हर जगह है, तू जन्नत में जा वहाँ पीना मना नहीं।" अब हम ये नहीं कहते कि हमें बिसलरी की बोतल जैसा इज़्ज़त मिले। लेकिन हमें चुराकर ले जाते समय एक सम्मानजनक जगह तो मिलनी 
चाहिए। 


       हम बोतलों का जब भी सृजन हुआ तब हम सब एक से थे। अपने अपने नसीब से अलग अलग पहुँचे। लेकिन भेदभाव बढ़ता जा रहा है। किसी बोतल में एक बार यूज़ होने के बाद  रिसायकिल होकर शराब भरी जा रही। और किसी में बिना रिसायकिल के बस नया स्टिकर लगा नकली शराब डाल दिया जा रहा। बार बार ऐसा होना शोषण ही तो है। हम सबके साथ एक व्यवहार होना चाहिए।


डियर प्रधानमंत्री जी!
     आप एकबार नीतीश चचा से बात कीजिये। हम शराब की बोतलों पर ध्यान दिया जाए। हम भले ही बैन करें रहिये। भले ही नाला गटर में फेंक दीजिये, लेकिन भेदभाव न कीजिये कि किसी नेता के यहाँ, पुलिस के यहाँ, पैसे वाले के यहाँ मिले और ग़रीब लोग शराबबंदी के नामपर जेल में सड़ते रहें। बस आप नीतीश चचा से कह देंगे तो सब ठीक हो जाएगा। काहे की हम सबको अभी भी अच्छे दिनों की उम्मीद है और दिल में बसा हुआ है ; मोदी है तो मुमकिन है।

समानता के इंतिज़ार में,
उदास शराब की बोतलें।


लेखक- सन्नी कुमार बोज़ो
20/11/2021

Friday, 19 November 2021

बेनाम सड़कें

आदरणीय,

हम आपसे बहुत नाराज़ हैं। आप तो समानता में विश्वास रखते हैं। जब भी मित्रों!! कहते हैं तब लगता है कि हम जैसे सुदूर इलाके में टूटी फूटी सड़कों को भी आप जी जान से प्यार करते हैं। लेकिन देखिए न बहुत बुरा लग रहा है। कुछ दिन पहले आप भोपाल आये थे। उससे पहले तक हम सब सड़कें अपना अपना क़िस्मत भोग रहे थे। इंस्टाग्राम पर हम जैसे सड़कों पर एक वीडियो भी बना एक डब्बे में धनिया मिर्च मसाला लेकर दो लोग हमारे ऊपर से गुजरे और थोड़े देर में अपने आप चटनी बन गयी। वीआईपी तरफ़ का रोड अक्सर चकाचक रहता है। हम समझते हैं उधर मुम्बई वाला फील आता है तो बढ़िया स्थिति रहती है। जब हम बने थे तो बड़ी खूबसूरत काले थे समय के साथ साथ थोड़ा धूप बारिस झेलते हुए गोरापन खा गया हमें। एक एक करके हमारे अलग अलग जगह पर मरम्मत होती रहती है तो बढ़िया काले हो जाते हैं उसकी अनुभूति ठीक वैसे है जैसे 15 लाख रुपये किसी के एकाउंट में आ गए हैं। सच कहिए तो काला धन आप जब भी वापस लाये हम सड़कों से कंपीटिशन मत कराइयेगा। हम काले धन से भी ज़्यादा काला रहना चाहते हैं। 

आदरणीय!
ये सब कहते कहते रोना इस बात का आ रहा है कि भोपाल में जब आपके आने की तैयारी हुई तो हम उसमें शामिल नहीं हुए। हमारा जो भी भाई लोग शामिल होने वाला था सब अच्छे से पिच हो गए, बढ़िया पेंटिंग डेंटिंग हो गयी उनकी। सब लोग कह रहे थे कि पूरा वाशिंगटन डीसी जैसा हो रहा है सड़क। सच पूछिए तो वाशिंगटन डीसी की सड़कों से हमारी बातचीत नहीं है फिर भी मान लिए की जिस भी सड़क की मरम्मत हुई वो उनके जैसे ही बन गए। बात ये है कि धीरे धीरे बनते तो सही तरीके से बिल पास होता सड़क बनने का तो कोई दुःख नहीं होता लेकिन सिर्फ़ आपके आगमन से ही उनका उद्धार हो गया ये तो वही बात हुई कि किसी विशेष जगह कोई जन्म लिया है, विशेष जाति में जन्मा है तो भाग्य के नाम पर उसको सब नसीब हो जाये और हम नहीं है वैसे तो हमारे नाम के रिज़र्वेशन को भी पहुँचने में हज़ारों साल लग जाये। पता है आपको जिनसे आप गुज़रे अब वो सड़के हमें मुँह तक नहीं लगाती। उनका भाग्य ही बदल गया है अब हमें कैसे पहचानेंगे। मुँह चिढ़ाते हैं हमारा। अगर वो न भी चिढाये तो कुछ लोग चाय की टपरी पर बैठे बैठे कह देते हैं "भाई चलो नयी सड़कों पर घूम के आये"। हँसतें हैं हम पर "जाने कब ये सड़कें बनेंगी"।

आदरणीय!
हम सब किसी विशेष क्षेत्र में होने के कारण सदियों से अनदेखा किये जाते रहे सड़कें,
हमेशा से हे कि दृष्टि से देखी जाती रही सड़कें, 
हम जिनपर लोग सिर्फ़ ट्रोल करने के लिए गाड़ियां चलाते हैं या मज़बूरी में,
हम सड़के जो चाहते हैं कि प्रेमी जोड़े हमारे तरफ़ से भी गुज़रे,
वो सड़कें जो आपके आगमन पर भी याद नहीं कि गई।
बस आपसे विनती है कि बस झूठा वादा ही कर दीजिए कि हमारे तरफ़ आएंगे आप। हमारा नसीब बदल देंगे आसपड़ोस के नेता सभी। मुझे विश्वास है कि आप हम सबको ऐसे भेदभाव का शिकार नहीं होने देंगे। 
आप पूरा करें न करें। बस एक झूठा वादा ही कर दीजिए हमारा भाग्य बदल जायेगा।


आपका
आपसे नाराज़
आपके इंतिज़ार में
बेनाम सडकें
🙏🙏🙏

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...