Wednesday, 29 September 2021

कविताएँ

जब भी शाम होती है,
हर किस्म की कविताएँ दौड़ते हुए आती हैं
जैसे पकड़म पकड़ाई खेलते हुए घर लौटते बच्चे।

कुछ हाफ़तें हुये कहती हैं 
हम यहाँ छुपे, यहाँ भागे
इसको हराया, इससे जीते
इससे प्रेम किया, उनसे डाँट खायी

कुछ पसीने से लथपथ
ज़ोर से साँस लेती रहती हैं
कह नहीं पाती किससे डरकर भागी है,
कौन पीछा कर रहा था।

कुछ यूँ देखती हैं जैसे कह रही हो
अच्छा हुआ शाम हो गयी
"कुछ देर और होती तो शायद हार जाती मैं"
कह नहीं पाती की किसी आंदोलन से होकर आयी है।

कुछ लौटते ही आँखें मूंदे सो जाती हैं
उनके खर्राटें की होती है एक अलग क़िस्म
कभी कभी बंध जाती है घिग्घी,
मानों सपने में ही किसी ने गला दबा दिया हो।

सपने में मर रही कविता को
जब भी बचाता हूँ, अपने अंदर पाता हूँ।


@बोज़ो

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