प्रश्न- टीचर्स कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
1. वो जो अभी किसी सरकारी स्कूल में टीचर हैं।
2. जो किसी प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं।
3. वो जो ख़ुद की कोचिंग चलाते हैं।
4. वो जो एक स्टूडेंट है और ट्यूशन भी पढ़ाते हैं।
इस बात पर बात करना ऐसे है, जैसे खुशी मनाने से ज़्यादा इस बात के लिए दौड़ पड़ना की ये खुशी किस वज़ह से है। हो सकता है जब मैं यह बात आगे बढाऊँ आप मुझे नकारने लगेंगे। आपका नकारना मेरे लिए कल्पना मात्र है इसीलिए डर लग रहा है, अगर सच में नकार दिया जाऊँगा, तो स्वीकार कर, सुस्ता लूंगा। चलो कम से कम नकारने लायक तो हूँ मैं।
शिक्षक दिवस जितने हर्षोल्लास से मना रहा हूँ मैं, सभी टीचर्स याद आ रहे हैं उनकी सिखाई गयी बातें, दिए गए संस्कार सब कहीं न कहीं, मेरे व्यक्तित्व में आ जाते हैं। हम सभी जिन्होंने किसी टीचर्स से, किसी बात के लिए कभी लड़ बैठे हो, जीवन में लड़ने का वैसा संस्कार हमारे अंदर शामिल रहता है। हम सभी में से जिन्हें भी, क्लास में किसी टीचर्स से नकारा गया, ध्यान नहीं दिया गया कि हम पढ़ने में अच्छे नहीं सिर्फ़ खेल पर दिमाग़ जाता है। एक समय पर किस चीज़ का चयन करना है, का संस्कार शामिल हो आता है हममें ख़ुद ब ख़ुद।
हमारे जीवन में हम जो हो पाएंगे वो घर और शिक्षक से होते हुए समाज तक पहुंचता है, हम कितना भी कहें "हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता,सिर्फ़ हमारे अंदर इच्छा होनी चाहिये। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता।" हम ख़ुद में ऊर्जा का कितना ही बड़ा स्रोत हो समाज हमारी परिधि तय करता है। समाज अगर इस उर्ज़ा में शामिल है फिर आप अनन्त तक जा पाएंगे। यही 'उर्ज़ा' शिक्षक, परिवार, दोस्त की तरह शामिल होते हैं हम में। तब तक जब तक एक वक़्त बाद ये समाज की परिधि में शामिल न हो जाए। फिर केंद्र में आप सिर्फ़ अपनी उर्ज़ा के साथ बचते हैं।
हम जिस परिवेश में रहते है। गांव है। यहाँ जब आप एक स्टूडेंट होते है तब बहुत से लोग छोटे छोटे बच्चों को ट्यूशन देते हैं। तब ये स्टूडेंट्स टीचर्स होते हैं। बहुत से लोग जो एक समय के बाद नौकरी की तैयारी कर रहे होते हैं ख़ुद की किताब ख़रीद पाने के लिए, एग्जाम फॉर्म भर पाने के लिए ट्यूशन पढ़ाते हैं। ऐसा शहरों में भी होता है। बहुत से लोग इसलिए पढ़ाते हैं क्योंकि वो पढ़ा सकते हैं जो सीखा है वो दूसरों तक पहुंचा सकते हैं (ऐसा होना कितना खूबसूरत है न)।
किसी को पढ़ा सकने की उर्ज़ा, या एक टीचर हो सकने की उर्ज़ा, नौकरी न मिल पाने के बाद एक परिधि में सिमट जाती है। यह नौकरी "टीचर" बनने के लिए नहीं चाहिए होती है। यह नौकरी इसलिए चाहिए होती है की समाज में ट्यूशन पढ़ाने वाले टीचर "नौकरी वाले भैया/दीदी" कहें जा सके। एक स्थिर जीवन हो जहाँ महीने में किसी बच्चे से बार बार न कहना पड़े "बेटा महीना लग गया है, पापा को कहना पिछले महीने का भी पैसा दे दे, दरोग़ा का फॉर्म भरना है।"
मुझे मालूम है यह पढ़ते वक़्त आप जो दिल से एक वक़्त में टीचर ही होना चाहते थे और हुए भी, वो नकारेंगे मुझे। लेकिन यक़ीन मानिए शायद देश के किसी हिस्से का सच है ये। जब समाज में आप एक टीचर रहते हुए भी लोगों द्वारा पूछे जाते हैं "कब आ रहा है रिजल्ट SSC वाला, रेलवे वाला?" तब कई सारे जवाब मिलते है अंदर से कहीं। "टीचर" होना मंज़िल नहीं है? टीचर होना जीवन नहीं है? कब मैं इस चीज़ से आगे निकलूंगा। कब अपने लिए कुछ कर पाऊँगा। कब अपने परिवार के लिए कुछ कर पाऊँगा। शायद ये सारे सवाल "5 सितम्बर" को हर साल दब जाते हैं बच्चों के मुस्कान के पीछे बहुत दूर कहीं। बाकी के 364 दिन बच्चों के सवालों के जवाब देते देते हमेशा ख़ुद से पूछा सवाल सामने आता है। कब बदलेगा सबकुछ।
हम सभी को अपने आसपास मालूम होता है की हमारे साथ पढ़ने वालों में से या हमें पढ़ाने वालों में से कौन एक बेहतर शिक्षक हो सकता है। इन सब के बावजूद भी जब कभी भी बात होती है की जीवन में क्या करना है तो "डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, पायलेट, आर्मी" इन सबके अलावा हम कितनी बार सुने होंगे। टीचर जी टीचर जी हमें न टीचर बनना है।। न जाने अपने जीवन में कितने ही अच्छे टीचर्स पाये मैंने जो पूरी उम्र टीचर रह सकते थे। छोड़िए उनकी बात क्या ही करें।
स्वयं की उर्ज़ा बचाकर जो भी अल्पकालीन शिक्षक हुए उन सभी को प्रणाम के साथ क्षमा याचना है कि मैं आपकी उर्ज़ा में शामिल नहीं बल्कि समाज की परिधि पर खड़ा हूँ। इस टीचर्स डे सभी अल्पकालीन टीचर्स को भी हैप्पी टीचर्स डे। साथ ही सभी शिक्षकों और स्टूडेंट्स को भी हैप्पी टीचर्स डे।
@आपका बोज़ो
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