Monday, 14 September 2020

"हिंदी दिवस"

कभी भी,
जन्मदिन मनाने में 
शामिल नहीं होता किसी और के 
मृत्यु का मज़ाक 
या किसी और के जन्म से द्वेष

उत्सव में
मुँह नहीं चिढ़ाते पटाखें
बीते रंगों के त्योहार को

किसी से प्रेम करना
किसी से ईर्ष्या का 
विलोम नहीं हो सकता

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Sunday, 6 September 2020

ये दिन याद बहुत आएंगे..

यार!
ये दिन याद बहुत आएंगे....

कितना कुछ जिया है न, 
हमनें इस पड़ाव में
लंच, शिवानी, सब यादें,
उस पेड़ की छाव में
वो ड्राफ्टर का डब्बा, 
वो रोलर की रोलिंग
बंक मारने पर धमकी, 
करूँ पैरेंट्स को कॉलिंग
MP नगर का चौराहा, 
वही अब भी है पिपलानी
दोस्तों के चक्कर में यारों 
बन जाते थे दानी
लेक व्यू की लहरें कहेंगी, 
कहाँ गई वो टोली ?
जिसके होने से थी रंगत
दुनिया थी रंगोली,
कितना भी समेटें यादें 
समेट नहीं पाएंगे,
यार!
ये दिन याद बहुत आएंगे, 
याद बहुत आएंगे

रातों को देखेंगे तारें,
टेकरी की याद सताएगी
तुम्हारा दोस्त अच्छा है, 
हमकों कौन बताएगी
अभिव्यक्ति का झूला,
ऊचें से हमको पुकारेगा
बर्थडे पर विश से पहले,
GPL कौन मरेगा
महंगे कॉफी मिलने पर 
भी यादव की याद आएगी
सारे काम, सारी दुनिया,
 यादों में रुक जाएगी
हाथों में हम चाय लिए
रोते भी मुस्काएँगे
यार! 
ये दिन याद बहुत आएंगे, 
याद बहुत आएंगे...

@बोज़ो

Saturday, 5 September 2020

अल्पकालीन शिक्षकों को भी "हैप्पी टीचर्स डे"

प्रश्न- टीचर्स कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर- 
1. वो जो अभी किसी सरकारी स्कूल में टीचर हैं।
2. जो किसी प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं।
3. वो जो ख़ुद की कोचिंग चलाते हैं।
4. वो जो एक स्टूडेंट है और ट्यूशन भी पढ़ाते हैं।

इस बात पर बात करना ऐसे है, जैसे खुशी मनाने से ज़्यादा इस बात के लिए दौड़ पड़ना की ये खुशी किस वज़ह से है। हो सकता है जब मैं यह बात आगे बढाऊँ आप मुझे नकारने लगेंगे। आपका नकारना मेरे लिए कल्पना मात्र है इसीलिए डर लग रहा है, अगर सच में नकार दिया जाऊँगा, तो स्वीकार कर, सुस्ता लूंगा। चलो कम से कम नकारने लायक तो हूँ मैं। 

शिक्षक दिवस जितने हर्षोल्लास से मना रहा हूँ मैं, सभी टीचर्स याद आ रहे हैं उनकी सिखाई गयी बातें, दिए गए संस्कार सब कहीं न कहीं, मेरे व्यक्तित्व में आ जाते हैं। हम सभी जिन्होंने किसी टीचर्स से, किसी बात के लिए कभी लड़ बैठे हो, जीवन में लड़ने का वैसा संस्कार हमारे अंदर शामिल रहता है। हम सभी में से जिन्हें भी, क्लास में किसी टीचर्स से नकारा गया, ध्यान नहीं दिया गया कि हम पढ़ने में अच्छे नहीं सिर्फ़ खेल पर दिमाग़ जाता है। एक समय पर किस चीज़ का चयन करना है, का संस्कार शामिल हो आता है हममें ख़ुद ब ख़ुद।

हमारे जीवन में हम जो हो पाएंगे वो घर और शिक्षक से होते हुए समाज तक पहुंचता है, हम कितना भी कहें "हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता,सिर्फ़ हमारे अंदर इच्छा होनी चाहिये। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता।" हम ख़ुद में ऊर्जा का कितना ही बड़ा स्रोत हो समाज हमारी परिधि तय करता है। समाज अगर इस उर्ज़ा में शामिल है फिर आप अनन्त तक जा पाएंगे। यही 'उर्ज़ा' शिक्षक, परिवार, दोस्त की तरह शामिल होते हैं हम में। तब तक जब तक एक वक़्त बाद ये समाज की परिधि में शामिल न हो जाए। फिर केंद्र में आप सिर्फ़ अपनी उर्ज़ा के साथ बचते हैं।


हम जिस परिवेश में रहते है। गांव है। यहाँ जब आप एक स्टूडेंट होते है तब बहुत से लोग छोटे छोटे बच्चों को ट्यूशन देते हैं। तब ये स्टूडेंट्स टीचर्स होते हैं। बहुत से लोग जो एक समय के बाद नौकरी की तैयारी कर रहे होते हैं ख़ुद की किताब ख़रीद पाने के लिए, एग्जाम फॉर्म भर पाने के लिए ट्यूशन पढ़ाते हैं। ऐसा शहरों में भी होता है। बहुत से लोग इसलिए पढ़ाते हैं क्योंकि वो पढ़ा सकते हैं जो सीखा है वो दूसरों तक पहुंचा सकते हैं (ऐसा होना कितना खूबसूरत है न)। 


किसी को पढ़ा सकने की उर्ज़ा, या एक टीचर हो सकने की उर्ज़ा, नौकरी न मिल पाने के बाद एक परिधि में सिमट जाती है। यह नौकरी "टीचर" बनने के लिए नहीं चाहिए होती है। यह नौकरी इसलिए चाहिए होती है की समाज में ट्यूशन पढ़ाने वाले टीचर "नौकरी वाले भैया/दीदी" कहें जा सके। एक स्थिर जीवन हो जहाँ महीने में किसी बच्चे से बार बार न कहना पड़े "बेटा महीना लग गया है, पापा को कहना पिछले महीने का भी पैसा दे दे, दरोग़ा का फॉर्म भरना है।" 


मुझे मालूम है यह पढ़ते वक़्त आप जो दिल से एक वक़्त में टीचर ही होना चाहते थे और हुए भी, वो नकारेंगे मुझे। लेकिन यक़ीन मानिए शायद देश के किसी हिस्से का सच है ये। जब समाज में आप एक टीचर रहते हुए भी लोगों द्वारा पूछे जाते हैं "कब आ रहा है रिजल्ट SSC वाला, रेलवे वाला?" तब कई सारे जवाब मिलते है अंदर से कहीं। "टीचर" होना मंज़िल नहीं है? टीचर होना जीवन नहीं है? कब मैं इस चीज़ से आगे निकलूंगा। कब अपने लिए कुछ कर पाऊँगा। कब अपने परिवार के लिए कुछ कर पाऊँगा। शायद ये सारे सवाल "5 सितम्बर" को हर साल दब जाते हैं बच्चों के मुस्कान के पीछे बहुत दूर कहीं। बाकी के 364 दिन बच्चों के सवालों के जवाब देते देते हमेशा ख़ुद से पूछा सवाल सामने आता है। कब बदलेगा सबकुछ।

हम सभी को अपने आसपास मालूम होता है की हमारे साथ पढ़ने वालों में से या हमें पढ़ाने वालों में से कौन एक बेहतर शिक्षक हो सकता है। इन सब के बावजूद भी जब कभी भी बात होती है की जीवन में क्या करना है तो "डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, पायलेट, आर्मी" इन सबके अलावा हम कितनी बार सुने होंगे। टीचर जी टीचर जी हमें न टीचर बनना है।। न जाने अपने जीवन में कितने ही अच्छे टीचर्स पाये मैंने जो पूरी उम्र टीचर रह सकते थे। छोड़िए उनकी बात क्या ही करें। 

 स्वयं की उर्ज़ा बचाकर जो भी अल्पकालीन शिक्षक हुए उन सभी को प्रणाम के साथ क्षमा याचना है कि मैं आपकी उर्ज़ा में शामिल नहीं बल्कि समाज की परिधि पर खड़ा हूँ। इस टीचर्स डे सभी अल्पकालीन टीचर्स को भी हैप्पी टीचर्स डे। साथ ही सभी शिक्षकों और स्टूडेंट्स को भी हैप्पी टीचर्स डे।

@आपका बोज़ो
🙏🙏🙏







Tuesday, 1 September 2020

हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए

  


जब भी कोई पंक्ति जनजागरण की हो जाती है तब हमें उन पंक्तियों का उद्देश्य पता होता है, लिखने वाले को भले ही हम न जान पाये। बस इतना समझ आता है कोई हम जैसा है कहीं जिसने हमारी बात कहने की हिम्मत की है। ऐसी पंक्तियां हमेशा के लिए इंक़लाब और बदलाव का पर्याय हो जाती हैं। किसी भी आंदोलन के कुरुक्षेत्र में ऐसी पंक्तियां सारथी का काम करती हैं। ऐसी ही पंक्तियां मैंने सुनी थी 8th क्लास के जिला स्तरीय बाल मेला में। कुढ़नी ब्लॉक से "क्विज़" की प्रतियोगिता में शामिल होकर ब्लॉक का प्रतिनिधि करना, बचपन में हार जीत से बढ़कर अलग ही अभिमान में रखता था। बिहार के लगभग 17 जिले से हज़ारों बच्चों के बीच मंच को संचालित करने वाले शिक्षक ने शायद सभी से कहा 'मेरी बात दुहराइये

"हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए"

सिकंदरपुर का पूरा स्टेडियम गूंज गया। मुझे उस समय का आख़िरी लाइन "आग जलनी चाहिए" याद रहा। ये आग धीरे धीरे चिंगारी में वापस से बदलकर दिल के किसी कोने में रही। तबतक रही जबतक की "मसान" मूवी में श्वेता त्रिपाठी ने "दुष्यंत कुमार" का ज़िक्र नहीं किया। तबतक हाथों में इंटरनेट के लिए मोबाइल हो चुका था। बस ऐसे ही गूगल पर "दुष्यंत कुमार" की रचनाओं में "आग
जलनी चाहिए" मिला। वो जो चिंगारी थी फिर से जैसे आग होने लगी बस इतना रहा की मालूम नहीं रहा ये आग कैसी है। शायद हर किसी के ज़ेहन में यह सवाल उठना चाहिए, ये कैसी आग जलनी चाहिए की बात करते हैं दुष्यंत, क्यों कहते है आग जलनी चाहिए?


जब इंसान एक सरकारी पद पर रहकर सरकार की नीतियों से समाज की समस्याओं को देखता है, तब बदलाव की गूंज अंदर से आंदोलन का स्वरूप लेती है। (अगर व्यक्ति में संवेदनशीलता बाकी हो)। वैसे ग़लत को ग़लत कहने के लिए किसी सरकारी पद पर होना कितना तर्क संगत है आज यह नहीं कह सकते। जहाँ आज नौकरी के लिए लोग आंदोलन कर रहे वहाँ कोई नौकरी को खोने की सम्भावनाओं से डर कर चुप ही रहेगा। लेकिन आप "दुष्यंत कुमार" हैं। आपने उस समय सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बेबाकी से लिखा। जो लगता है आज के लिए लिखी गई हो;
"कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये"


वैसे तो हर दौर में साहित्यिक समाज में रचनाओं को अपनाने और आलोचनाओं की बात जारी रहती है। इन सबसे आगे आपने हिंदी को पहला "हिंदी ग़ज़ल" कहने वाला दिया। शायद ये कहें की आपने अपनी रचनाओं में पूरे हिंदुस्तान को रखा किसी एक हिस्से को नहीं। पीड़ाओं को कहने के लिए, आंदोलन को कहने के लिए, बदलाव को कहने के लिए, बदलाव को लाने के लिए सामान्य से लेकर विशेष तक के सभी को एक स्तर पर अगर लाना है तो आप दुष्यंत हैं। "साये में धूप" पहली ऐसी संग्रह है जिस किताब के नाम में ही हम सोचने को ठहरते है यह कैसे सम्भव है "साये में धूप"? जब दुष्यंत को पढ़ेंगे आप लगेगा। किसी गाँव से कोई इंसान आवाज़ देने लगा है ;
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.

इन सबमें एक बात शामिल ये करना चाहूँगा। साहित्य अपने आपमें एक समाज है जो पूरे समाज में एक हिस्सा है, साहित्य स्वयं में पूरा समाज नहीं है। हम हमेशा साहित्यिक समाज में बाकी बचे समाज को शामिल करते हैं। जब समाज साहित्य को अपने में शामिल करता है तब क्रांति होती है। तब पूरे समाज के सीने में एक आग जलने लगती है। सीने में आग लिए हुए भी जब हम ये कहते है;
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ,
चेतना को जगाने के साथ साथ बदलाव की क्रांति हो रही होती है। पूरा समाज "दुष्यंत" हो रहा होता है।


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सबसे ज़्यादा धन्यवाद "कुमार विश्वास" जी का जिनके "महाकवि" सिरीज़ से बहुत मदद मिला। पोस्टर के लिए The Book Review Adda का बेहद शुक्रिया.
साथ साथ इंटरनेट का तो है ही, आप सभी एक बार "दुष्यंत कुमार" जी को ज़रूर पढ़े।
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हालांकि बहुत कुछ बाकी रह गया है कहना फिर भी इसमें गलतियों के लिए पहले ही माफ़ी चाहूँगा। मुझे कुछ पंक्तियां याद आ रही है जो मेरा दोस्त अभिनिष 8th क्लास में अक्सर कहता था, वही आपसे कहना चाहता हूँ मैं

"माटी का पुतला हूँ, आपसे जुदा नहीं
ग़लती हो तो माफ करना, इंसान हूँ ख़ुदा नहीं"

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आपका बोज़ो

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...