जब हम किसी का ज़िक्र करते हैं वो फिर से उस कहानी को जीते हैं। इसीलिए सबसे पहले माफ़ी चाहूँगा सभी रूहों से जो हिस्सा रही हैं "भोपाल गैस त्रासदी" की। 10th क्लास में ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन सही करने के एक नंबर मिलते थे। हमनें और हमारे दोस्तों ने आसानी से याद करके खुश हो गए थे कि एक नम्बर कहीं नहीं गया। सवाल था "भोपाल गैस त्रासदी" में कौन सा गैस ज़िम्मेदार था? "मिथाइल इसोसायनेट" वो भी ये सवाल रसायन विज्ञान का था। कहीं कहीं ऐसे भी पूछते थे कि MIC का फुलफॉर्म क्या है? मिथाइल इसोसायनेट को हमेशा से ज़िम्मेदार की तरह याद किया हमनें। वैसे भी किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में ख़ासकर ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन में यह आसानी से पूछ लिया जाता है। आज 8 सालों बाद मुझे फिजिक्स में पढ़ा न्यूटन के नियम में से प्रथम गति नियम "कोई भी वस्तु अपनी गति की अवस्था बनाये रखता है जबतक की उसपर कोई बाहरी असन्तुलित बल(unbalanced force) कार्य न करें" याद हो आया है।
जिसे भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार मानते आया हूँ वो कहाँ था? मैं ये सवाल फिजिक्स के नियम से ही पूछ रहा हूँ। कौन था असन्तुलित बल? किसी एंगल से लगा था वह बल? मेरे एक लेख लिखने से सवालों का ज़वाब तो नहीं मिलेगा लेकिन ये सवाल 1984 से हर दिन पूछे जाते रहे हैं। मगर ज़वाब कौन दे? मिथाइल इसोसायनेट ने तो उत्तर में "बाहरी असन्तुलित बल" 2 दिसम्बर की रात ही दे चुका है। लेकिन वो बाहरी असन्तुलित बल ऐसे बल है जिनकी अपनी मर्ज़ी है ज़वाब दे या न दें। वैसे किसी भी न्याय और आंदोलन की पहली शर्त है धैर्य।
आप सबको सनी देओल का वो डायलॉग याद होगा "तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़ मिलती है जज साहब पर इंसाफ़ नहीं मिलता"। ये डायलॉग अच्छी लगी इसीलिए आपको भी बता दिया। मैं ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा बस इतना ही कि वो एक नम्बर का जो सवाल है न कसम से अगर याद रहे तो किसी का एक नम्बर से कोई नौकरी न छूटे। लेकिन दोस्त कभी जब भोपाल जाने का मौका मिले तो उस ज़गह को देखो। जिससे तुम्हें एक नम्बर तुम्हारे एग्जाम में मिला है। अभी भी 2 दिसम्बर की वो रात तुम्हें बहुत सारे ज़वाब देगी। हाँ, पर तुम सवाल मत पूछना किसी से नहीं तो क्या पता कौन सा बाहरी बल तुम्हारी नौकरी को गति की अवस्था से विराम की अवस्था में ले आये।
"भोपाल गैस त्रासदी" के बारे में जानने के लिए बहुत से स्रोत है आज इंटरनेट पर। लेकिन वास्तविकता और समाचार कभी कभी नदी के दो किनारे हो जाते है। और इन दो किनारों के बीच न जाने कितने दशक बहते चले जाते हैं, बिना किसी किनारे पर गए हुए। जिस रोज़ दोनों किनारों को जोड़ती हुई कोई पुलिया बन जाएगी। भोपाल गैस त्रासदी किसी परीक्षा के सवाल से उठकर पूरे समाज का सवाल बनकर खड़ा हो जाएगा।