Saturday, 20 November 2021

शराब की बोतलों ने लिखी प्रधानमंत्री को चिट्ठी

डियर 
प्रधानमंत्री जी!

     हम बिहार में "शराब की बोतलें" आपसे बहुत उम्मीद लगाये हुए हैं। हमारे साथ ये भेदभाव मत होने दीजिए। पहले सब को बराबर उपलब्ध होते थे तो कोई भी ख़रीद लेता था। ऐसा नहीं था कि सिर्फ़ पैसे वाले या पावर वाले लोग खरीदें हमकों। हमकों बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ऐसे। हमसें भी तो कंसेंट लिया जाए। पहले जिनके पास पैसे नहीं होते थे वो अपने दिन की मज़दूरी का हिस्सा हमारे नाम करते थे। उनसा प्यार हमें सबसे मिलता था। हाँ, हम बोतलों में भरी शराब के ख़तम होने का दुष्प्रभाव हम कभी नहीं चाहते। जब भी हमारे ख़ाली होने पर कोई अपनी पत्नी को पिटता है तो सच मानिए जी करता हैं जहाँ रखें हैं वहीं से उड़ के जाए और सरपर जोड़ से लग जाये उस इंसान के। और अपने सारे बोतल समाज में उस इंसान की ख़बर पहुंचा दें कि इस इंसान के हाथ कभी न लगना। चाहे उनके पास पावर हो या न हो। कोई पुलिस हो या नेता या कोई व्यापारी ऐसे किसी इंसान के हाथ नहीं लगना हमें जो हमारे बिना कंसेंट के अपने पॉवर का धौंस जमाये।

    शराबबंदी के बाद से हम बोतलों को बहुत ही हे कि नज़र से देखा जाने लगा। छूपाने लगें लोग। ऐसे आज़ादी की बात करें तो कंगना जी की बात सही ग़लत है नहीं कहना उसपर लेकिन हमारी आज़ादी पूरी छीन गयी। बात ऐसी भी नहीं है कि हम आज़ादी चाहते हैं कि हर कोई हमारे साथ दिन रात रहने का पागलपन कर बैठे। पर हमें भी आज़ादी चाहिए। पहले दिन दहाड़े निकलते थे। अब कभी शर्ट में, कभी थम्स अप के बोतल में, कभी दवा के डब्बे में, कभी गाड़ी की डिक्की में, हमें आज़ादी चाहिए ऐसे व्यहवार से जो हमें छुपाने के लिए न जाने कौन से पॉकेट में रख लेते हैं।

      हम बोतलें ट्रक के ट्रक एक साथ पकड़ें गयें। हम बोतलें दूसरे राज्य से आते हुए पकड़े गयें। हम बोतलें गाड़ी की डिक्की में भी पकड़ें गए। हम बोतलें सुनसान खेतों के बीच ख़ुफ़िया जगह पर पकड़ें गयें। हम बोतलें लंडन ठुमकता डांस देखते समय भी धर लिए गए बाराती में। बहुत बार कहने का मन हुआ "ग़ज़ब बेइज्जती है।" लेकिन अब क्या करें हमलोग। हमलोगों को जितना इज़्ज़त पुराने शायरों ने दिया अब नहीं मिल रहा। .
ग़ालिब हमारे लिये लड़े, उन्होंने कहा:"शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता जहाँ ख़ुदा नहीं।" वसी साहब ने लड़ा कहा "खुदा तो मौजूद दुनिया में हर जगह है, तू जन्नत में जा वहाँ पीना मना नहीं।" अब हम ये नहीं कहते कि हमें बिसलरी की बोतल जैसा इज़्ज़त मिले। लेकिन हमें चुराकर ले जाते समय एक सम्मानजनक जगह तो मिलनी 
चाहिए। 


       हम बोतलों का जब भी सृजन हुआ तब हम सब एक से थे। अपने अपने नसीब से अलग अलग पहुँचे। लेकिन भेदभाव बढ़ता जा रहा है। किसी बोतल में एक बार यूज़ होने के बाद  रिसायकिल होकर शराब भरी जा रही। और किसी में बिना रिसायकिल के बस नया स्टिकर लगा नकली शराब डाल दिया जा रहा। बार बार ऐसा होना शोषण ही तो है। हम सबके साथ एक व्यवहार होना चाहिए।


डियर प्रधानमंत्री जी!
     आप एकबार नीतीश चचा से बात कीजिये। हम शराब की बोतलों पर ध्यान दिया जाए। हम भले ही बैन करें रहिये। भले ही नाला गटर में फेंक दीजिये, लेकिन भेदभाव न कीजिये कि किसी नेता के यहाँ, पुलिस के यहाँ, पैसे वाले के यहाँ मिले और ग़रीब लोग शराबबंदी के नामपर जेल में सड़ते रहें। बस आप नीतीश चचा से कह देंगे तो सब ठीक हो जाएगा। काहे की हम सबको अभी भी अच्छे दिनों की उम्मीद है और दिल में बसा हुआ है ; मोदी है तो मुमकिन है।

समानता के इंतिज़ार में,
उदास शराब की बोतलें।


लेखक- सन्नी कुमार बोज़ो
20/11/2021

Friday, 19 November 2021

बेनाम सड़कें

आदरणीय,

हम आपसे बहुत नाराज़ हैं। आप तो समानता में विश्वास रखते हैं। जब भी मित्रों!! कहते हैं तब लगता है कि हम जैसे सुदूर इलाके में टूटी फूटी सड़कों को भी आप जी जान से प्यार करते हैं। लेकिन देखिए न बहुत बुरा लग रहा है। कुछ दिन पहले आप भोपाल आये थे। उससे पहले तक हम सब सड़कें अपना अपना क़िस्मत भोग रहे थे। इंस्टाग्राम पर हम जैसे सड़कों पर एक वीडियो भी बना एक डब्बे में धनिया मिर्च मसाला लेकर दो लोग हमारे ऊपर से गुजरे और थोड़े देर में अपने आप चटनी बन गयी। वीआईपी तरफ़ का रोड अक्सर चकाचक रहता है। हम समझते हैं उधर मुम्बई वाला फील आता है तो बढ़िया स्थिति रहती है। जब हम बने थे तो बड़ी खूबसूरत काले थे समय के साथ साथ थोड़ा धूप बारिस झेलते हुए गोरापन खा गया हमें। एक एक करके हमारे अलग अलग जगह पर मरम्मत होती रहती है तो बढ़िया काले हो जाते हैं उसकी अनुभूति ठीक वैसे है जैसे 15 लाख रुपये किसी के एकाउंट में आ गए हैं। सच कहिए तो काला धन आप जब भी वापस लाये हम सड़कों से कंपीटिशन मत कराइयेगा। हम काले धन से भी ज़्यादा काला रहना चाहते हैं। 

आदरणीय!
ये सब कहते कहते रोना इस बात का आ रहा है कि भोपाल में जब आपके आने की तैयारी हुई तो हम उसमें शामिल नहीं हुए। हमारा जो भी भाई लोग शामिल होने वाला था सब अच्छे से पिच हो गए, बढ़िया पेंटिंग डेंटिंग हो गयी उनकी। सब लोग कह रहे थे कि पूरा वाशिंगटन डीसी जैसा हो रहा है सड़क। सच पूछिए तो वाशिंगटन डीसी की सड़कों से हमारी बातचीत नहीं है फिर भी मान लिए की जिस भी सड़क की मरम्मत हुई वो उनके जैसे ही बन गए। बात ये है कि धीरे धीरे बनते तो सही तरीके से बिल पास होता सड़क बनने का तो कोई दुःख नहीं होता लेकिन सिर्फ़ आपके आगमन से ही उनका उद्धार हो गया ये तो वही बात हुई कि किसी विशेष जगह कोई जन्म लिया है, विशेष जाति में जन्मा है तो भाग्य के नाम पर उसको सब नसीब हो जाये और हम नहीं है वैसे तो हमारे नाम के रिज़र्वेशन को भी पहुँचने में हज़ारों साल लग जाये। पता है आपको जिनसे आप गुज़रे अब वो सड़के हमें मुँह तक नहीं लगाती। उनका भाग्य ही बदल गया है अब हमें कैसे पहचानेंगे। मुँह चिढ़ाते हैं हमारा। अगर वो न भी चिढाये तो कुछ लोग चाय की टपरी पर बैठे बैठे कह देते हैं "भाई चलो नयी सड़कों पर घूम के आये"। हँसतें हैं हम पर "जाने कब ये सड़कें बनेंगी"।

आदरणीय!
हम सब किसी विशेष क्षेत्र में होने के कारण सदियों से अनदेखा किये जाते रहे सड़कें,
हमेशा से हे कि दृष्टि से देखी जाती रही सड़कें, 
हम जिनपर लोग सिर्फ़ ट्रोल करने के लिए गाड़ियां चलाते हैं या मज़बूरी में,
हम सड़के जो चाहते हैं कि प्रेमी जोड़े हमारे तरफ़ से भी गुज़रे,
वो सड़कें जो आपके आगमन पर भी याद नहीं कि गई।
बस आपसे विनती है कि बस झूठा वादा ही कर दीजिए कि हमारे तरफ़ आएंगे आप। हमारा नसीब बदल देंगे आसपड़ोस के नेता सभी। मुझे विश्वास है कि आप हम सबको ऐसे भेदभाव का शिकार नहीं होने देंगे। 
आप पूरा करें न करें। बस एक झूठा वादा ही कर दीजिए हमारा भाग्य बदल जायेगा।


आपका
आपसे नाराज़
आपके इंतिज़ार में
बेनाम सडकें
🙏🙏🙏

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...