डियर
प्रधानमंत्री जी!
हम बिहार में "शराब की बोतलें" आपसे बहुत उम्मीद लगाये हुए हैं। हमारे साथ ये भेदभाव मत होने दीजिए। पहले सब को बराबर उपलब्ध होते थे तो कोई भी ख़रीद लेता था। ऐसा नहीं था कि सिर्फ़ पैसे वाले या पावर वाले लोग खरीदें हमकों। हमकों बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ऐसे। हमसें भी तो कंसेंट लिया जाए। पहले जिनके पास पैसे नहीं होते थे वो अपने दिन की मज़दूरी का हिस्सा हमारे नाम करते थे। उनसा प्यार हमें सबसे मिलता था। हाँ, हम बोतलों में भरी शराब के ख़तम होने का दुष्प्रभाव हम कभी नहीं चाहते। जब भी हमारे ख़ाली होने पर कोई अपनी पत्नी को पिटता है तो सच मानिए जी करता हैं जहाँ रखें हैं वहीं से उड़ के जाए और सरपर जोड़ से लग जाये उस इंसान के। और अपने सारे बोतल समाज में उस इंसान की ख़बर पहुंचा दें कि इस इंसान के हाथ कभी न लगना। चाहे उनके पास पावर हो या न हो। कोई पुलिस हो या नेता या कोई व्यापारी ऐसे किसी इंसान के हाथ नहीं लगना हमें जो हमारे बिना कंसेंट के अपने पॉवर का धौंस जमाये।
शराबबंदी के बाद से हम बोतलों को बहुत ही हे कि नज़र से देखा जाने लगा। छूपाने लगें लोग। ऐसे आज़ादी की बात करें तो कंगना जी की बात सही ग़लत है नहीं कहना उसपर लेकिन हमारी आज़ादी पूरी छीन गयी। बात ऐसी भी नहीं है कि हम आज़ादी चाहते हैं कि हर कोई हमारे साथ दिन रात रहने का पागलपन कर बैठे। पर हमें भी आज़ादी चाहिए। पहले दिन दहाड़े निकलते थे। अब कभी शर्ट में, कभी थम्स अप के बोतल में, कभी दवा के डब्बे में, कभी गाड़ी की डिक्की में, हमें आज़ादी चाहिए ऐसे व्यहवार से जो हमें छुपाने के लिए न जाने कौन से पॉकेट में रख लेते हैं।
हम बोतलें ट्रक के ट्रक एक साथ पकड़ें गयें। हम बोतलें दूसरे राज्य से आते हुए पकड़े गयें। हम बोतलें गाड़ी की डिक्की में भी पकड़ें गए। हम बोतलें सुनसान खेतों के बीच ख़ुफ़िया जगह पर पकड़ें गयें। हम बोतलें लंडन ठुमकता डांस देखते समय भी धर लिए गए बाराती में। बहुत बार कहने का मन हुआ "ग़ज़ब बेइज्जती है।" लेकिन अब क्या करें हमलोग। हमलोगों को जितना इज़्ज़त पुराने शायरों ने दिया अब नहीं मिल रहा। .
ग़ालिब हमारे लिये लड़े, उन्होंने कहा:"शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर, या वो जगह बता जहाँ ख़ुदा नहीं।" वसी साहब ने लड़ा कहा "खुदा तो मौजूद दुनिया में हर जगह है, तू जन्नत में जा वहाँ पीना मना नहीं।" अब हम ये नहीं कहते कि हमें बिसलरी की बोतल जैसा इज़्ज़त मिले। लेकिन हमें चुराकर ले जाते समय एक सम्मानजनक जगह तो मिलनी
चाहिए।
हम बोतलों का जब भी सृजन हुआ तब हम सब एक से थे। अपने अपने नसीब से अलग अलग पहुँचे। लेकिन भेदभाव बढ़ता जा रहा है। किसी बोतल में एक बार यूज़ होने के बाद रिसायकिल होकर शराब भरी जा रही। और किसी में बिना रिसायकिल के बस नया स्टिकर लगा नकली शराब डाल दिया जा रहा। बार बार ऐसा होना शोषण ही तो है। हम सबके साथ एक व्यवहार होना चाहिए।
डियर प्रधानमंत्री जी!
आप एकबार नीतीश चचा से बात कीजिये। हम शराब की बोतलों पर ध्यान दिया जाए। हम भले ही बैन करें रहिये। भले ही नाला गटर में फेंक दीजिये, लेकिन भेदभाव न कीजिये कि किसी नेता के यहाँ, पुलिस के यहाँ, पैसे वाले के यहाँ मिले और ग़रीब लोग शराबबंदी के नामपर जेल में सड़ते रहें। बस आप नीतीश चचा से कह देंगे तो सब ठीक हो जाएगा। काहे की हम सबको अभी भी अच्छे दिनों की उम्मीद है और दिल में बसा हुआ है ; मोदी है तो मुमकिन है।
समानता के इंतिज़ार में,
उदास शराब की बोतलें।
लेखक- सन्नी कुमार बोज़ो
20/11/2021