उन दिनों मैं पुलिस अधिकारियों को फैसिलिटेट कर रहा था। विषय था: जेंडर बेस्ड वॉयलेंस एंड सेंसिटाइजेशन। हमारा फोकस महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने और यह समझने पर था कि पुलिस—जो न्याय की पहली सीढ़ी होती है—इसमें कैसे मदद कर सकती है।
हर वर्कशॉप की शुरुआत में, पहले ही घंटे में अक्सर अधिकारी कहते:
"आप लोगों को पुरुषों पर होने वाली हिंसा की ट्रेनिंग लेनी चाहिए। महिलाओं के बारे में तो होता ही रहता है। यह नया ज़माना है—अब महिलाओं पर अत्याचार नहीं होता, अब तो पुरुष पीड़ित हैं। लेकिन हमारी कोई सुनता ही नहीं है।"
तीन दिन बाद, उन्हीं के उठाए कई सवालों के जवाब वे खुद ही ढूंढ़ने लगते थे।
लेकिन वही existential crisis वाली बात सामने आती—कि यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा की घटनाएं बहुत ज़्यादा हैं, तो फिर खुद को भी बदलना पड़ेगा।
फिर भी, ट्रेनिंग के बाद हम कई सकारात्मक बदलाव और ज़रूरी बातचीत होते हुए देखते।
एक बार, मैंने साथ में फैसिलिटेट कर रहे एक साथी से पूछा था:
"जब हम महिलाओं पर होने वाली हिंसा की बात करते हैं, तभी पुरुषों पर होने वाली हिंसा की बात क्यों उठती है? यह बात पहले, बाद या समानांतर भी तो आ सकती है?"
उनका जवाब था:
"हिंसा तो हिंसा है—किसी के साथ भी हो, ग़लत है। लेकिन अक्सर लोग एक हिंसा के मुकाबले दूसरी हिंसा को इस तरह खड़ा कर देते हैं, मानो पहली हिंसा का कोई अस्तित्व ही न हो।"
हिंसा किसी के साथ भी हो, निंदनीय है।
हमें हर प्रकार की हिंसा को समझना और सहेजना चाहिए, लेकिन दो प्रकार की हिंसा को एक-दूसरे के सामने खड़ा करने से न तो हिंसा खत्म होगी, न ही कम।
@बोज़ो
13 अप्रैल 2025