प्रिय अमृता!
जन्मदिन मुबारक़ हो। वैसे मेरी दादी का बर्थडे हमनें कभी याद ही नहीं रखा। जब भी कोई सपना देखा तो दादी के हाथों को अपने माथे पर महसूस किया। तुम्हारी उम्र तो दादी से भी ज़्यादा हो चुकी है। फिर भी जब से जाना है, पता नहीं कैसा एहसास है। मैं ख़ुद को तुम्हारी उम्र का पाता हूँ, या तुम्हें ख़ुद की उम्र का। जाने क्या है की जितना ज़्यादा पढ़ता गया हूँ तुम और हम उम्र होती चली गई हो। मैं यह बात पहले इसीलिए बता रहा क्योंकि मैं "तुम" कह पा रहा हूँ। वैसे एक बात कहूँ मेरे एक भैया हैं "वरुण नामदेव" उन्होंने मुझसे पूछा था की तुम सभी के नाम के साथ भैया दीदी क्यों लगा देते हो, मैंने जवाब में यह कह दिया था की "हम बिहार से है न भैया वहाँ हम अपने से उम्र में बड़ों को भैया दीदी बोलते हैं, आदर है भैया, दीदी शब्द किसी के लिए। वरुण भैया ने जवाब दिया था "अगर प्रेम है, आदर है तो केवल नाम में ही पता चल जाएगा।
फिर से
प्रिय अमृता!
हमारे तुम्हारे जन्म में 76 सालों का फ़र्क़ है। पर सच कहूँ ऐसा कभी नहीं लगा। "वंदना दीदी" (वंदना पाण्डेय) के ज़ुबान से पहली दफ़े सुना था, "अमृता प्रीतम" को पढ़ा है तुमनें? नहीं...मैंने कहा था। दिशा दीदी (दिशा मालवीय) साथ थी उस रोज़। फिर यूट्यूब पर तुम्हारे नाम से ज़्यादा "साहिर" और "इमरोज़" को पाया। गूगल के हर आर्टीकल में तुम्हारे नाम से ज़्यादा तुम्हारे प्रेम को पाया। एक बात कहूँ जो भी तुम्हारे नाम तक पहुंचता है मानों प्रेम की तरफ़ जा रहा हो, आज़ादी की तरफ़ जा रहा हो, रुके हुए पड़ाव से आगे बढ़ रहा हो।
प्रिय अमृता!
मैं तुझे फिर मिलूंगी। साथ ऐसे जुड़ा जैसे हमारे गांव में कोई यज्ञ में पढ़ा जाने वाला मंत्र। जैसे बुद्ध के मौन में कहे जाने वाली सारी बातें। एक वक़्त ऐसा आया जब ये ख़याल आया "उषा त्रिलोक" की जगह मैं क्यों नहीं था। मैं बातों बातों में शायद प्रेम की खुशबू अपनी रूह में महसूस कर पाता। फिर खुश भी हुआ की कम से कम उस वक़्त में न रहा पर "उषा" जी के कारण ही अपने आपको आसपास महसूस कर पाया। रसीदी टिकट, कोरे कागज़, प्रतिनिधि कवताएँ सब के सब और क़रीब लाते गए। ये सारी किताबें मुझमें प्रेम का एक अलग संस्कार देती रही वैसे ही जैसे दुनिया को समझने के लिए दादी अपने किस्सों में देती।
प्रिय अमृता!
ये कितना खूबसूरत है न जब भी मैं "अमृता" कहता हूँ लगता है मैं इमरोज़ कह रहा हूँ, लगता है मैं साहिर कह रहा हूँ। शायद मैं तीनों नाम एक साथ शामिल करके "अमृता" कह देना चाहता हूँ। जब 9th क्लास में रसखान की भक्ति पद पढ़ा था तो लगता था ऐसा ही किसी रोज़ किसी के लिए मैं बनूंगा। फिर दसवीं में "घनानंद और सूजान" पढ़ने के बाद मैं घनानंद होना चाहता रहा अपनी सुजान के लिए। तुमने इमरोज़ से कहा था न 'इमरोज़ तुम मेरी ज़िंदगी की शाम में क्यों मिले, दोपहर में क्यों नहीं' मैं कहना चाहता हूँ मैं अपने जीवन के सुबह में क्यों न जान सका तुम्हें। "कोरे कागज़" का वो ख़त अभी तक ज़हन में ट्रेन की सीट पर बैठे मिलते हैं। एक सफ़र पर है, जाने किस स्टेशन रात होगी और मैं उतर जाऊंगा।
प्रिय अमृता!
पिछले साल तुम्हारे बर्थडे के दिन ही "मनोज नायर" सर ने तुम्हारी कहानी "बू" पर एक नाटक का मंचन किया था। कितनी ही बार पढ़ी हुई कविता और कहानियों में "बू" बार बार ख़ामोश कर देता है। इस बर्थडे मेरे पास "दस्तावेज़" है। ऐसा लगता है जैसे आने वाली पीढियां जो अपने प्रेम में लिखेंगी सबके बदले तुमनें लिख दिया है। जी लिया है। सच कहूँ तो हर बार, कहीं भी कोई अमृता कहता है तो तुम शामिल हो जाती हो नये तरीके से। ज़िन्दगी के इस दोपहर जैसे वक़्त में "इमरोज़, साहिर और तुम" शामिल हो गई हो मुझमें। न जाने रात ढलते ढलते मैं साहिर होता हूँ, इमरोज़ होता हूँ या अमृता।
@बोज़ो
--------------------------------¶Read about Amrita Preetam - https://en.m.wikipedia.org/wiki/Amrita_Pritam
¶Do you know Sahir Ludhiyanavi -
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Sahir_Ludhianvi
¶इमरोज़ से मिलो - https://www.google.com/amp/s/m.hindustantimes.com/punjab/imroz-the-abiding-love-in-amrita-pritam-s-life/story-e8JajaDuE724oFbYPFmcUM_amp.html
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