Monday, 31 August 2020

अमृता प्रीतम के नाम ख़त


प्रिय अमृता!

जन्मदिन मुबारक़ हो। वैसे मेरी दादी का बर्थडे हमनें कभी याद ही नहीं रखा। जब भी कोई सपना देखा तो दादी के हाथों को अपने माथे पर महसूस किया। तुम्हारी उम्र तो दादी से भी ज़्यादा हो चुकी है। फिर भी जब से जाना है, पता नहीं कैसा एहसास है। मैं ख़ुद को तुम्हारी उम्र का पाता हूँ, या तुम्हें ख़ुद की उम्र का। जाने क्या है की जितना ज़्यादा पढ़ता गया हूँ तुम और हम उम्र होती चली गई हो। मैं यह बात पहले इसीलिए बता रहा क्योंकि मैं "तुम" कह पा रहा हूँ। वैसे एक बात कहूँ मेरे एक भैया हैं "वरुण नामदेव" उन्होंने मुझसे पूछा था की तुम सभी के नाम के साथ भैया दीदी क्यों लगा देते हो, मैंने जवाब में यह कह दिया था की "हम बिहार से है न भैया वहाँ हम अपने से उम्र में बड़ों को भैया दीदी बोलते हैं, आदर है भैया, दीदी शब्द किसी के लिए।  वरुण भैया ने जवाब दिया था "अगर प्रेम है, आदर है तो केवल नाम में ही पता चल जाएगा। 

फिर से 
प्रिय अमृता! 
हमारे तुम्हारे जन्म में 76 सालों का फ़र्क़ है। पर सच कहूँ ऐसा कभी नहीं लगा। "वंदना दीदी" (वंदना पाण्डेय) के ज़ुबान से पहली दफ़े सुना था, "अमृता प्रीतम" को पढ़ा है तुमनें? नहीं...मैंने कहा था। दिशा दीदी (दिशा मालवीय) साथ थी उस रोज़। फिर यूट्यूब पर तुम्हारे नाम से ज़्यादा "साहिर" और "इमरोज़" को पाया। गूगल के हर आर्टीकल में तुम्हारे नाम से ज़्यादा तुम्हारे प्रेम को पाया। एक बात कहूँ जो भी तुम्हारे नाम तक पहुंचता है मानों प्रेम की तरफ़ जा रहा हो, आज़ादी की तरफ़ जा रहा हो, रुके हुए पड़ाव से आगे बढ़ रहा हो।


प्रिय अमृता!
मैं तुझे फिर मिलूंगी। साथ ऐसे जुड़ा जैसे हमारे गांव  में कोई यज्ञ में पढ़ा जाने वाला मंत्र। जैसे बुद्ध के मौन में कहे जाने वाली सारी बातें। एक वक़्त ऐसा आया जब ये ख़याल आया "उषा त्रिलोक" की जगह मैं क्यों नहीं था। मैं बातों बातों में शायद प्रेम की खुशबू अपनी रूह में महसूस कर पाता। फिर खुश भी हुआ की कम से कम उस वक़्त में न रहा पर "उषा" जी के कारण ही अपने आपको आसपास महसूस कर पाया। रसीदी टिकट, कोरे कागज़, प्रतिनिधि कवताएँ सब के सब और क़रीब लाते गए। ये सारी किताबें मुझमें प्रेम का एक अलग संस्कार देती रही वैसे ही जैसे दुनिया को समझने के लिए दादी अपने किस्सों में देती। 


प्रिय अमृता!
ये कितना खूबसूरत है न जब भी मैं "अमृता" कहता हूँ लगता है मैं इमरोज़ कह रहा हूँ, लगता है मैं साहिर कह रहा हूँ। शायद मैं तीनों नाम एक साथ शामिल करके "अमृता" कह देना चाहता हूँ। जब 9th क्लास में रसखान की भक्ति पद पढ़ा था तो लगता था ऐसा ही किसी रोज़ किसी के लिए मैं बनूंगा। फिर दसवीं में "घनानंद और सूजान" पढ़ने के बाद मैं घनानंद होना चाहता रहा अपनी सुजान के लिए। तुमने इमरोज़ से कहा था न 'इमरोज़ तुम मेरी ज़िंदगी की शाम में क्यों मिले, दोपहर में क्यों नहीं' मैं कहना चाहता हूँ मैं अपने जीवन के सुबह में क्यों न जान सका तुम्हें। "कोरे कागज़" का वो ख़त अभी तक ज़हन में ट्रेन की सीट पर बैठे मिलते हैं। एक सफ़र पर है, जाने किस स्टेशन रात होगी और मैं उतर जाऊंगा।

प्रिय अमृता!
पिछले साल तुम्हारे बर्थडे के दिन ही "मनोज नायर" सर ने तुम्हारी कहानी "बू" पर एक नाटक का मंचन किया था। कितनी ही बार पढ़ी हुई कविता और कहानियों में "बू" बार बार ख़ामोश कर देता है। इस बर्थडे मेरे पास "दस्तावेज़" है। ऐसा लगता है जैसे आने वाली पीढियां जो अपने प्रेम में लिखेंगी सबके बदले तुमनें लिख दिया है। जी लिया है। सच कहूँ तो हर बार, कहीं भी कोई अमृता कहता है तो तुम शामिल हो जाती हो नये तरीके से। ज़िन्दगी के इस दोपहर जैसे वक़्त में "इमरोज़, साहिर और तुम" शामिल हो गई हो मुझमें। न जाने रात ढलते ढलते मैं साहिर होता हूँ, इमरोज़ होता हूँ या अमृता। 


@बोज़ो
--------------------------------¶Read about Amrita Preetam - https://en.m.wikipedia.org/wiki/Amrita_Pritam

¶Do you know Sahir Ludhiyanavi - 
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Sahir_Ludhianvi

¶इमरोज़ से मिलो - https://www.google.com/amp/s/m.hindustantimes.com/punjab/imroz-the-abiding-love-in-amrita-pritam-s-life/story-e8JajaDuE724oFbYPFmcUM_amp.html
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Poster by - @Thebookreviewadda


Friday, 28 August 2020

"सड़क 2" को डिसलाइक किया की नहीं?

 जब भी कोई क्रांति होती है तो उसका एक लक्ष्य होता है, फिर उस लक्ष्य को लोग अपना बनाते हुए क्रांति में शामिल हो जाते हैं। पूरे देश में "सड़क 2" को डिसलाइक करने की क्रांति हो रही है।

यह जो क्रांति पूरे देश में है शायद "नेपोटिज़्म" के ख़िलाफ़ है। यह लड़ाई इनसाइडर और आउटसाइडर की है। 
सबसे पहला सवाल ये है की इस क्रांति के आख़िरी में हम क्या चाहते हैं?
उत्तर- नेपोटिज़्म ख़त्म हो, सबको बराबर का अधिकार मिले
सवाल - कैसे होगा नेपोटिज़्म ख़त्म?
उत्तर- ट्रेलर को डिसलाइक करके...
सवाल- कौन से ट्रेलर डिसलाइक करने हैं?
उत्तर- स्टारकिड्स वाले 
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अगर इस क्रांति का यही प्रॉसेस है तो यह अभी हो रहा है, लाखों डिसलाइक मिल रहे है स्टारकिड्स के फिल्मों को, बॉयकॉट भी धड़ल्ले से हो रहा है। जिस रफ़्तार से यह हो रहा है वैसे आप इस क्रांति को सफ़ल ही मानिए। मुबारक़ हो क्रांतिकारियों आपकी क्रांति सफ़ल हुई।
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बस थोड़े से सवाल रह गए हैं मैं अज्ञानी आपसे पूछना चाहता हूँ। 
क्या नेपोटिज़्म के विपरीत नये लोगों को अवसर दिलाना हमारा लक्ष्य है?
या फिर जो पहले से योग्य हैं यह उन्हें अवसर दिलाना उनका स्पोर्ट करना हमारा लक्ष्य है?

अगर "हाँ" ऐसा ही लक्ष्य है तो फिर इस क्रांति के दिनों में आपने "सड़क 2" को डिसलाइक करने के बदले या साथ साथ कितने ऐसे आर्टिस्ट का स्पोर्ट किया। यूट्यूब पर सबके ट्रेलर हैं थोड़ा सा काम आपके लिए छोड़ रहा हूँ बस डेटा मैच कीजिये अपनी क्रांति का डिसलाइक के या यूं कहिए नफ़रत के चक्कर में आपने सड़क2 का views जितना बढ़ाया है उसका कोई भी प्रतिशत दूसरे किसी नॉन-नेपोटिज़्म वाले आर्टिस्ट को नहीं मिला है। 

यदि आप यहाँ यह कहेंगे की बाकी आउटसाइडर का आपको पता नहीं है या आपको किसी दोस्त ने या किसी फेसबुक पोस्ट ने नहीं बताया है की और किन्हें लाइक करना है तो आप अपनी ही क्रांति के साथ गद्दार हो जाएंगे। मैं यहाँ किसी भी ट्रेलर के बारे में नहीं कहूँगा की आप जाकर देखो या डिसलाइक करो। बस ये कहूँगा की बहुत बड़ी भीड़ है, बहुत भयंकर आग है लेकिन इस आग में कोई दूसरा रोटी सेक जाएगा आपको जलाके। यूट्यूब पर व्यू से भी रेवेन्यू जेनेरेट होते हैं तो गुस्से में ही सही आपने उनका व्यू काउंट बढ़ाया। आपके गुस्से में सबके पास सड़क 2 तो पहुँचा है लेकिन बाकी के अच्छे मूवीज़ के बारे में आपने बात नहीं की है। 

आपके गुस्से से नेपोटिज़्म ख़त्म होगा या नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन आपके स्पोर्ट से बाकी deserving आर्टिस्ट का हौसला बढ़ेगा और फ़ायदा मिलेगा। 

प्रिय क्रांतिकारियों अपनी क्रांति में गुस्से के साथ साथ थोड़ा सा प्यार डिज़रविंग आर्टिस्ट, ट्रेलर और मूवीज़ के लिए भी लाइये।
( अभी तक तो आपने ऐसा नहीं किया है अगर नहीं यक़ीन तो जाकर यूट्यूब पर सभी के व्यूज, लाइक और डिसलाइक देख लीजिये)।

source- youtube

Tuesday, 18 August 2020

साथ आइये, कुल्हाड़ी चलाइये, पूरी दुनिया से पेड़ मिटाइये

दोस्तों!!!
मैं एक मज़ेदार काम करने में आप सबकी मदद चाहता हूँ। और वह मज़ेदार काम है "पूरी दुनिया का पेड़ काटना।" है न मज़ेदार काम। कुल्हाड़ी आपके पास नहीं हो तो हमकों बताइएगा एक एक रुपया जुगाड़ेंगे तो बहुत सी कुल्हाड़ी हो जाएगी। दंगों में हिस्सा लेने वाले हमारे दोस्तों से भी उधार ले लेंगे काटने की चीज़ें। अगर आप तैयार हैं तो आगे का प्लान बताता हूँ।

सबसे पहली शुरुआत अभी "सेवाग्राम" से कर सकते हैं। बेहतरीन खूबसूरत शुरुआत। वहाँ से शुरू करेंगे तो सरकार से सहयोग भी मिलेगा। वहाँ न बापू के समय के लागये गए पेड़ हैं वैसे भी पेड़ कटने से पेड़ ख़ुद तोड़े न दौड़ कर मारने आएंगे वैसे  भी बापू के पेड़ ठहरे, क्या ही कर लेंगे, आप एक पेड़ काटोगे दूसरा पेड़ ख़ुद को आगे बढ़ा देगा कटने के लिए। हा हा हा यार सोच के ही मज़ा आ रहा है। 

इसके बाद हमलोग न एक साथ कुल्हाड़ी रैली निकलेंगे। 
"पेड़ कहाँ हैं बतायें आप,
आ रहे हैं कुल्हाड़ी छाप"

चलते चलते दोपहर में धूप होगी तो किसी छायादार पीपल को काट के गिरा देंगे और फिर उसी पेड़ के चबूतरे पर टेंट लगाएंगे। जंगलों में वन विभाग के कुछ सदस्य अपने में से ही कुछ लोग हैं वो किसी को बताये बिना ही पेड़ काटते रहे हैं अभी तक तो उनको उनका काम करने देते हैं। हम लोग शहरों में पार्क में बचे पेड़ को काटेंगे, ऐसा करेंगे वहाँ न खेल रहे बच्चों को प्रेरित करेंगे फिर उनसे पेड़ कटवाएंगे। वैसे भी भविष्य एक न एक दिन उन्हीं को सौंपना है।

यार मध्यप्रदेश में, झारखंड में आदिवासियों को वैसे भी जल, जंगल और ज़मीन के लिए लड़ रहे हैं। पूरा जंगल ही काट देंगे तो कितना अच्छा रहेगा पूरा का पूरा संघर्ष ही ख़त्म। अहा! राहत ही राहत...सबको सुकून

अब देखो आप न वैज्ञानिक बात मत करो की पर्यावरण का क्या होगा। वर्षा का क्या होगा। WWF वाले केस कर देंगे हम सभी पर। अरे भाई हम कहाँ कोई ग़लत काम कर रहे। हम तो बस सरकार की मदद कर रहे। हमारा सरकार पर पूरा भरोसा है की वो ग़लत नहीं कर सकती। और सरकार ही पेड़ काटने के आदेश दे रही। हम तो एक सच्चे और देशभक्त नागरिक होने का फ़र्ज़ निभा रहे हैं। मिलकर सरकार की मदद करेंगे।
तो बताइये चलेंगे न हमारे साथ, कुल्हाड़ी रैली में...
अभी सेवग्राम में मस्त काम हो रहा है वहीं से शुरुआत करेंगे....


#savetreesofsevagram

Sunday, 9 August 2020

"भारत छोड़ो आंदोलन"



प्रकाश जेलों के तोड़ेंगे तालें
अरुणा साथ में देश संभालें
इन्दिरा वानरी लेकर आयेगी
लोहिया साथ में जुलूस निकाले
अब की लड़ाई ना अंग्रेजों से
ना मतभेद जापान से,
सवालों से सवाल है करना
अब पूरे हिंदुस्तान से
सत्य अहिंसा का उन्मूलन
फिर से हो जाने दो
भारत छोड़ो आंदोलन
फिर से हो जाने दो...
राजनीति यहाँ भाई को
है भाई से बाँट रहें,
व्यापारी गरीबी "बो" कर
गरीबों को ही काट रहे,
क्रिप्स जैसे कई मिशन
देश में अब भी ज़ारी है
घर से निकलने में
डर रही हर नारी है,
सारे डर को समझ "अंग्रेज"
आज जान से जाने दो,
भारत छोड़ो आंदोलन
फिर से हो जाने दो...
करो या मरो का नारा
अब फिर से हुंकार भरे,
हर थाली में पहुँचे रोटी
अब ना कोई भूखा मरे,
अहिंसा का चोला देख
आतंकवाद भी हमसे डरे,
जात पात तोड़ सभी को
दाग़ देश का धो जाने दो,
भारत छोड़ो आंदोलन
फिर से हो जाने दो...


कोई चित्तू फिर से आकर
समानांतर सरकार बनाये,
समाज के ज़ंजीरो में जकड़े
बहनों को आज़ाद कराये,
"जय हिंद
" का नारा फिर
साथ मिल हिंदुस्तान लगाये,
1942 की वो क्रांति
एक बार दुहराने दो ,
भारत छोड़ो आंदोलन
फिर से हो जाने दो...

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...