जब भी कोई पंक्ति जनजागरण की हो जाती है तब हमें उन पंक्तियों का उद्देश्य पता होता है, लिखने वाले को भले ही हम न जान पाये। बस इतना समझ आता है कोई हम जैसा है कहीं जिसने हमारी बात कहने की हिम्मत की है। ऐसी पंक्तियां हमेशा के लिए इंक़लाब और बदलाव का पर्याय हो जाती हैं। किसी भी आंदोलन के कुरुक्षेत्र में ऐसी पंक्तियां सारथी का काम करती हैं। ऐसी ही पंक्तियां मैंने सुनी थी 8th क्लास के जिला स्तरीय बाल मेला में। कुढ़नी ब्लॉक से "क्विज़" की प्रतियोगिता में शामिल होकर ब्लॉक का प्रतिनिधि करना, बचपन में हार जीत से बढ़कर अलग ही अभिमान में रखता था। बिहार के लगभग 17 जिले से हज़ारों बच्चों के बीच मंच को संचालित करने वाले शिक्षक ने शायद सभी से कहा 'मेरी बात दुहराइये
"हो गई है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए"
सिकंदरपुर का पूरा स्टेडियम गूंज गया। मुझे उस समय का आख़िरी लाइन "आग जलनी चाहिए" याद रहा। ये आग धीरे धीरे चिंगारी में वापस से बदलकर दिल के किसी कोने में रही। तबतक रही जबतक की "मसान" मूवी में श्वेता त्रिपाठी ने "दुष्यंत कुमार" का ज़िक्र नहीं किया। तबतक हाथों में इंटरनेट के लिए मोबाइल हो चुका था। बस ऐसे ही गूगल पर "दुष्यंत कुमार" की रचनाओं में "आग
जलनी चाहिए" मिला। वो जो चिंगारी थी फिर से जैसे आग होने लगी बस इतना रहा की मालूम नहीं रहा ये आग कैसी है। शायद हर किसी के ज़ेहन में यह सवाल उठना चाहिए, ये कैसी आग जलनी चाहिए की बात करते हैं दुष्यंत, क्यों कहते है आग जलनी चाहिए?
जब इंसान एक सरकारी पद पर रहकर सरकार की नीतियों से समाज की समस्याओं को देखता है, तब बदलाव की गूंज अंदर से आंदोलन का स्वरूप लेती है। (अगर व्यक्ति में संवेदनशीलता बाकी हो)। वैसे ग़लत को ग़लत कहने के लिए किसी सरकारी पद पर होना कितना तर्क संगत है आज यह नहीं कह सकते। जहाँ आज नौकरी के लिए लोग आंदोलन कर रहे वहाँ कोई नौकरी को खोने की सम्भावनाओं से डर कर चुप ही रहेगा। लेकिन आप "दुष्यंत कुमार" हैं। आपने उस समय सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बेबाकी से लिखा। जो लगता है आज के लिए लिखी गई हो;
"कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये"
वैसे तो हर दौर में साहित्यिक समाज में रचनाओं को अपनाने और आलोचनाओं की बात जारी रहती है। इन सबसे आगे आपने हिंदी को पहला "हिंदी ग़ज़ल" कहने वाला दिया। शायद ये कहें की आपने अपनी रचनाओं में पूरे हिंदुस्तान को रखा किसी एक हिस्से को नहीं। पीड़ाओं को कहने के लिए, आंदोलन को कहने के लिए, बदलाव को कहने के लिए, बदलाव को लाने के लिए सामान्य से लेकर विशेष तक के सभी को एक स्तर पर अगर लाना है तो आप दुष्यंत हैं। "साये में धूप" पहली ऐसी संग्रह है जिस किताब के नाम में ही हम सोचने को ठहरते है यह कैसे सम्भव है "साये में धूप"? जब दुष्यंत को पढ़ेंगे आप लगेगा। किसी गाँव से कोई इंसान आवाज़ देने लगा है ;
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.
इन सबमें एक बात शामिल ये करना चाहूँगा। साहित्य अपने आपमें एक समाज है जो पूरे समाज में एक हिस्सा है, साहित्य स्वयं में पूरा समाज नहीं है। हम हमेशा साहित्यिक समाज में बाकी बचे समाज को शामिल करते हैं। जब समाज साहित्य को अपने में शामिल करता है तब क्रांति होती है। तब पूरे समाज के सीने में एक आग जलने लगती है। सीने में आग लिए हुए भी जब हम ये कहते है;
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ,
चेतना को जगाने के साथ साथ बदलाव की क्रांति हो रही होती है। पूरा समाज "दुष्यंत" हो रहा होता है।
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सबसे ज़्यादा धन्यवाद "कुमार विश्वास" जी का जिनके "महाकवि" सिरीज़ से बहुत मदद मिला। पोस्टर के लिए The Book Review Adda का बेहद शुक्रिया.
साथ साथ इंटरनेट का तो है ही, आप सभी एक बार "दुष्यंत कुमार" जी को ज़रूर पढ़े।
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जलनी चाहिए" मिला। वो जो चिंगारी थी फिर से जैसे आग होने लगी बस इतना रहा की मालूम नहीं रहा ये आग कैसी है। शायद हर किसी के ज़ेहन में यह सवाल उठना चाहिए, ये कैसी आग जलनी चाहिए की बात करते हैं दुष्यंत, क्यों कहते है आग जलनी चाहिए?
जब इंसान एक सरकारी पद पर रहकर सरकार की नीतियों से समाज की समस्याओं को देखता है, तब बदलाव की गूंज अंदर से आंदोलन का स्वरूप लेती है। (अगर व्यक्ति में संवेदनशीलता बाकी हो)। वैसे ग़लत को ग़लत कहने के लिए किसी सरकारी पद पर होना कितना तर्क संगत है आज यह नहीं कह सकते। जहाँ आज नौकरी के लिए लोग आंदोलन कर रहे वहाँ कोई नौकरी को खोने की सम्भावनाओं से डर कर चुप ही रहेगा। लेकिन आप "दुष्यंत कुमार" हैं। आपने उस समय सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ बेबाकी से लिखा। जो लगता है आज के लिए लिखी गई हो;
"कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये, कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये"
वैसे तो हर दौर में साहित्यिक समाज में रचनाओं को अपनाने और आलोचनाओं की बात जारी रहती है। इन सबसे आगे आपने हिंदी को पहला "हिंदी ग़ज़ल" कहने वाला दिया। शायद ये कहें की आपने अपनी रचनाओं में पूरे हिंदुस्तान को रखा किसी एक हिस्से को नहीं। पीड़ाओं को कहने के लिए, आंदोलन को कहने के लिए, बदलाव को कहने के लिए, बदलाव को लाने के लिए सामान्य से लेकर विशेष तक के सभी को एक स्तर पर अगर लाना है तो आप दुष्यंत हैं। "साये में धूप" पहली ऐसी संग्रह है जिस किताब के नाम में ही हम सोचने को ठहरते है यह कैसे सम्भव है "साये में धूप"? जब दुष्यंत को पढ़ेंगे आप लगेगा। किसी गाँव से कोई इंसान आवाज़ देने लगा है ;
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये.
इन सबमें एक बात शामिल ये करना चाहूँगा। साहित्य अपने आपमें एक समाज है जो पूरे समाज में एक हिस्सा है, साहित्य स्वयं में पूरा समाज नहीं है। हम हमेशा साहित्यिक समाज में बाकी बचे समाज को शामिल करते हैं। जब समाज साहित्य को अपने में शामिल करता है तब क्रांति होती है। तब पूरे समाज के सीने में एक आग जलने लगती है। सीने में आग लिए हुए भी जब हम ये कहते है;
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ,
चेतना को जगाने के साथ साथ बदलाव की क्रांति हो रही होती है। पूरा समाज "दुष्यंत" हो रहा होता है।
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सबसे ज़्यादा धन्यवाद "कुमार विश्वास" जी का जिनके "महाकवि" सिरीज़ से बहुत मदद मिला। पोस्टर के लिए The Book Review Adda का बेहद शुक्रिया.
साथ साथ इंटरनेट का तो है ही, आप सभी एक बार "दुष्यंत कुमार" जी को ज़रूर पढ़े।
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हालांकि बहुत कुछ बाकी रह गया है कहना फिर भी इसमें गलतियों के लिए पहले ही माफ़ी चाहूँगा। मुझे कुछ पंक्तियां याद आ रही है जो मेरा दोस्त अभिनिष 8th क्लास में अक्सर कहता था, वही आपसे कहना चाहता हूँ मैं
"माटी का पुतला हूँ, आपसे जुदा नहीं
ग़लती हो तो माफ करना, इंसान हूँ ख़ुदा नहीं"
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"माटी का पुतला हूँ, आपसे जुदा नहीं
ग़लती हो तो माफ करना, इंसान हूँ ख़ुदा नहीं"
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आपका बोज़ो

♥️🌼🌼
ReplyDeleteThank youu
Delete❤️❤️
ReplyDeleteThank youu
Deleteबहुत खूब❣️💕
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