Friday, 29 May 2020

युवाओं के सोच को सलाम, एडुकेशन फॉर चेंज ने पूरे किए दो साल



हम सभी अपने समाज के अलग अलग हिस्सों को अलग अलग लोगों के ज़िम्मे छोड़ देते हैं। हमारे कर्तव्यों का हिस्सा भी कभी कभी हम ऐसे भूला देते हैं जैसे हमें कोई फ़र्क़ नहीं। लेकिन संवेदनायें कब किस मनुष्य को समाज निर्माण का कार्य सौंप दे यह समय की बात है। 
और आज समय ऐसे ही कुछ युवाओं की है ऐसे ही एक नाम की है जिसका नाम है "एजुकेशन फ़ॉर चेंज"। आज एजुकेशन फ़ॉर चेंज के ठीक दो साल पूरे हुए हैं। कोरोना के इस संकट में भी बच्चों के बीच मास्क, साबुन, बिस्किट और चॉकलेट बाँट कर दो साल पूरे होने का उत्सव साझा किया।

एजुकेशन फ़ॉर चेंज बिहार के तीन जिले मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी में आर्थिक स्थिति से कमजोर और समाज से कटे हुए बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का काम कर रही है। बच्चों को निशुल्क कॉपी किताब और मदद करने का काम करती है। स्कूल में नाम लिखा कर पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखने का बेहतरीन काम करती है।

"सन्तोष अम्बेडकर" बिहार के सीतामढ़ी के रहने वाले हैं। मुजफ्फरपुर से अपनी पढ़ाई के साथ साथ "एडुकेशन फ़ॉर चेंज" की स्थापना कर समाज को एक नई दिशा देने का काम किया है। (लोगों की मदद करने के लिए अपने नाम से जमा किये गए एल आई सी फण्ड भी निकाल लिया)
"एजुकेशन फ़ॉर चेंज" अहम सदस्यों में मुज़फ़्फ़रपुर जिले के बरकुरवा गाँव के बिट्टू कुमार बच्चों को पढ़ाते हुए कहते हैं "बस आने वाले कुछ साल और फिर हमसे जुड़े हुए सभी बच्चे पढ़ लिख कर ख़ुद का उज्ज्वल भविष्य बनाएंगे"। छोटे छोटे बच्चों में देश का भविष्य झलकता है। 
साथियों में तुर्की गाँव के "रजनीश" हमेशा कहते हैं हम सभी एक माध्यम हैं जो किसी के सेवा करने का अवसर हमें मिलता है। सोनू कुमार का  विश्वास है "आज समाज में शिक्षा के माध्यम से ही हम बदलाव ला सकते हैं"।

इस लॉकडाउन में क्या किया?
_____________________________________
एजुकेशन फ़ॉर चेंज ने इस पूरे लॉक डाउन में हर दिन लगभग 300 फ़ूड पैकेट्स ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाया वही जिले के अलग अलग गांव जैसे मोहनपुर, बरकुरवा, सिरोही, चढूआँ में सूखा राशन भी दिया।

तुर्की मेला गाछी में मध्यप्रदेश देवास के लगभग 80  और चित्रकूट उत्तरप्रदेश के 20 लोगों को खाना पहुचाने का काम करते करते कुढ़नी और मुज़फ़्फ़रपुर का ध्यान खिंचा जिससे सभी को पहले लॉक डाउन खत्म होने के बाद सरकारी राशन मिल पाया। वही कुछ और भी स्थानीय लोग मदद के लिए आगे आएं। जारी लॉकडाउन में भी लोगों की मदद कर रहें हैं। आजमगढ़ से 4 दिनों में मुज़फ़्फ़रपुर के तुर्की में पहुँचने वाले मालदह पश्चिम बंगाल के 8 लोगों को भोजन कराने के साथ साथ रास्ते के लिए भी भोजन दिया।

___________________________________

एडुकेशन फ़ॉर चेंज एक उदाहरण है सकारात्मक सोच की जिससे वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढियां भी समाज निर्माण में बढ़ चढ़ कर आगे आएंगे।

मज़दूर पिता के नाम एक ख़त

डिअर पापा!

कुछ किताबें रूमपर ही छोड़ के आया हूँ। पिछले महीने थोड़ी सी लेट हो गयी थी किराया देने में तो 200 ज़्यादा देने पड़े थे। आपको याद है एडमिशन की रिसिप्ट लिए हम दोनों ने तलवंडी सर्कल पर गन्ने की जूस पिये थे। वो अपने गांव लौट चले गए। मैं और रूम के पास के बाकी स्टूडेंट्स जो एक ही ऑटो से जाते थे कोचिंग, उन चाचा ने उसी ऑटो में अपने कमरे का समान लादकर जैसे तैसे अपनी पत्नी और बच्चे के साथ घर लौटें। इतनी जल्दी में लौटें की हम सबके पास उनका 1 हफ़्ता का किराया बाकी रह गया है। धीरे धीरे ज़यादातर मेस बंद हुए। 

   माँ के साथ कभी कभी आटा गूंथना काम आया। फिर भी आटा हाथ और बेलन में बहुत चिपकता रहा। चावल पकाना आसान रहा। पानी और चावल की सही मात्रा से खाने में आसानी हुई। अंडा करी बनाते समय तेल के छींटे चेहरे पर पड़ गए पूरी तरह अभी ठीक नहीं हुआ है, मरहम लगा रहा हूँ। हॉस्पिटल में सामान्य चिकित्सा कम हो रही है इसीलिए एक दो गोली लेकर ही आना पड़ा। दूध की दुकान पर सर्कल में खड़े होने के बाद भी टीपू भैया ने दूध के पैकेट पर 3 रुपये ज़्यादा लिए। पूरे शहर में यही हाल है, सत्याग्रह करने का वक़्त भी नहीं था और नहीं परिवेश।



पापा आपसे जब भी पूछता हूँ कैसे हो कहते हो "ठीक हूँ" सब बढ़िया है। इस बार भी यही कह रहे हो। इस बार तो सब देख रहा हूँ मैं। दिल्ली में फैक्ट्री बंद हो चुकी है। घर से बाहर नहीं निकले हैं लोग। खाना पहुँचाया जा रहा है घरों तक। कुछ लोग बाकी रह जा रहे हैं। कुछ बता नहीं पा रहे की भूखे हैं। पापा कुछ ऐसे भी होंगे "खाना खाया?" पूछने पर हाँ हाँ खा लिया है कहते होंगे। आपके जैसे ही। पापा कोचिंग की फीस की 2 इंस्टॉलमेंट अभी भी बाकी है। मुझे पता है की अभी कोई नौकरी नहीं है। माँ के खाते में 500 रुपये आये हैं जनधन खाता वाला। आपको पैसे भेज देगी माँ। 

पापा आप पैदल आ रहे हो ये फूफाजी ने कॉल पर बताया। छाले की बात न भी करोगे फिर भी हर रोज़ देख रहा हूँ मैं लोगों को। आप बिल्कुल भी नहीं बताओगे की रास्ते में कुछ खाने को मिला या नहीं। किसी ने पानी पीने भी दिया या नहीं। यहाँ स्कूल में क़ुरएन्टीन सेंटर बनाया गया है। पहले से मेडिकल जाँच और जल्दी आने से थोड़ी सी आसानी हुई। बसों से स्टूडेंट्स का वापस लाने का फैसला जैसा भी हो। अभी सबकुछ नज़र आ रहा है। 120 के क़रीब लोग बाहर के राज्यों से हैं। यहां 21 दिन रखा जाएगा प्रवासी मजदूरों को। 


पापा अब जब आप लौटोगों क़ुरएन्टीन के बाद घर पर। हम बातें करेंगे| वे सभी बातें जो आपने यह कहकर नहीं बताया की परेशान हो जाऊँगा मैं। आपके पैरों में छाले वाली बात भी अख़बार में देखते हुए माँ के मुँह से निकल गई तो जान पाया। बस अब आप जल्दी से आ जाओ। इस लॉकडाउन में साथ रहना है आपके। आपके गले लगना है। और कहना है "पापा  I love you"...


मजदूर बाप का 
छोटा बेटा

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...