Friday, 3 December 2021

दिल से दिल को कौन जोड़ेगा?

 

    हर समय हम एक यात्रा में होते हैं। साथी बदलते रहते हैं। जगहें बदलती रहती है। लोग बदलते रहते हैं। मौसम बदलता रहता है। जो नहीं बदलता वो है आपका जिया हुआ वक़्त। आपमें शामिल हो चुकी कुछ यादें। ज़िन्दगी का हिस्सा हो चुके कुछ सपने। 

  कुछ सपने समय के साथ दम तोड़ देते हैं। जैसे कोरोना के समय न जाने कितने सपनों ने ख़ुदकुशी की। न जाने कितनी आँखें इसीलिये नहीं सोयी की न टूटने का भरम लगा रहे। पर सच तो सच है। टूटना सच है। तो उसके टुकड़े चुभेंगे। तक़लीफ़ होगी। साँस रुक जाना चाहेंगी। हम मर जाना चाहेंगे।

  कुछ सपने बीज की तरह होते हैं। ज़ेहन में टूट कर गिरते भी हैं तो ज़िन्दगी के नए पड़ाव में उग आने की हिम्मत रखते हैं। वक़्त लाख बंज़र करना चाहे ज़िन्दगी को पर ये सपने उग आते हैं। इन सपनों को यक़ीन होता हैं "कोंपलें फिर आएंगी"। फिर यही सपने लौटते हैं अपने क़ब्र से। जगाते हैं नींद से। कहते हैं "चल उठ जा"। सवेरा हो चुका है। टूट गये हैं तो क्या! तूने ही तो कहा था "दिल से दिल को कौन जोड़ेगा? 

  कुछ सपने ज़िद्दी होते हैं। एकदम ढीठ। लाख मुश्किलें आये। लाख तूफ़ान आये। वक़्त कहे कि तेरा मर जाना ज़िंदा रहने से बेहतर है तब भी वो ठन जाते हैं लड़ने को। लड़ते रहते हैं वो सपने हक़ीक़त से। उफ़्फ़ ये ज़िद्दी सपने! इनके चिथड़े मिलते हैं हर जगह पर ये ज़िद्दी सपने अपने आप को वक़्त से रफ़्फ़ु किये बिना नहीं रुकते। एक रोज़ ये सपने हक़ीक़त का सूट पहन के चमकते हैं। यही सपने हमेशा से कहते हैं "हम जोड़ेंगे हम जोड़ेंगे"

(इस जन्मदिन पर, ये ख़ूबसूरत पल बच्चों के साथ)

तो आप बताओ 
"दिल से दिल को कौन जोड़ेगा"?

@बोज़ो

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