Monday, 6 December 2021

यात्राएँ



     मुझे याद नहीं रेल से जान पहचान कब हुई। रेलवे स्टेशन घर से बस 10 मिनट की दूरी पर है। शहर जाने के लिए सबसे पहली ट्रेन छे बजिया ट्रेन हुआ करती थी। हालांकि ये ट्रेन हमेशा छः बजे से पहले आती थी। शहर में रिक्शा चलाने जाने वाले लोगों के साथ साथ शहर में ट्यूशन पढ़ने जाने वाले लोगों के लिए ये ट्रेन हमेशा से साथी रही। ट्यूशन पढ़ने वाले लड़के लड़कियां शहर से ट्यूशन ख़तम कर लौटते वक्त अठ बजिया ट्रेन पकड़ते थे। हालांकि ये ट्रेन ज़्यादातर आठ बजे से लेट ही होती थी। 

       फिर 9 बजे से 10 बजे के बीच आती थी नौ बजिया ट्रेन। इस ट्रेन से मेरी जान पहचान बहुत पुरानी है। उतनी पुरानी जितनी मुझे मेरा दादी का सुनाया गया हर क़िस्सा का याद होना। इस ट्रेन से मैं अलग अलग मौके पर मिलता था। एक जब लीची के सीज़न में दादी के मायके जाते थे या रात को सपने में घबरा जाने के कारण भगत से दिखाने के लिए "जोगिया मठ" जाना होता था। हाँ, जब ठंड या बारिस के दिनों में सर्दी हो जाती थी तब सीधे शहर के बैंक रोड में "डॉक्टर गोपाल जैन" या जुरण छपरा दो नम्बर रोड "डॉक्टर ब्रजमोहन" के पास जाना होता था।

       ट्रेन में सफ़र करने से ज़्यादा यादें उसके आने के इंतिज़ार में बनी हैं। मैंने दादी को कभी टिकट काउंटर पर टिकट कटाते नहीं देखा था। एक बार जब सिर्फ़ माँ के साथ डॉक्टर के पास गया था तब माँ ने टिकट कटाया था। लौटकर मैंने दादी से पूछा "तू काहे न टिकट कटबैछही?" 
तब दादी ने पीले रंग का एक पास निकालकर दिखाया। हमारे पास महीने भर का पास है इसीलिए टिकट नहीं कटाते। उस समय तुर्की से मुज़फ़्फ़रपुर का किराया 6 रुपये था। टिकट का रंग पीला हुआ करता था। 

      ट्रेन के बारे में न जाने कितनी बातें दादी ने सिखलाया है। अगर कभी किसी चीज़ के लिए ट्रेन से उतरो और गाड़ी खुल जाए तो क्या करोगे? हम सारे भाई बहन कहते "तेज़ से दौर कर पकड़ लेंगे" दादी कहती अपने पास वाले डब्बे में चढ़ जाना। अगले स्टेशन पर फिर वहाँ पहुँचना जहाँ थे। हाँ, तब मोबाइल नहीं हुआ करता था। अगर किसी परिवार का कोई सदस्य उसी डब्बे में नहीं चढ़ा तो जी घबराहट में यही कहता था "फलां छूट गया" कैसे आएगा। ये घबराहट डर में तब बदलती जब ट्रेन मुज़फ़रपुर से लौटती हुई शाम की पचबजिया ट्रेन होती। दूर के 5 किलोमीटर तक शाम को कोई सवारी नहीं होती थी। लौटते लौटते बहुत लोगों को रात के रामायण का एक एपिसोड भी छूट जाता था। हालांकि तब टीवी किसी घर का नहीं बल्कि मोहल्ले का होता था। 

      जबसे अकेले ट्रेवल कर रहा हूँ, दादी कि ये बात याद रहती है। ट्रेन खुल जाए तो सबसे नज़दीक वाले डब्बे में चढ़ जाना। मुझे जहाँ तक याद हैं दादी के साथ हमनें अक्सर पैसेंजर ट्रेन में सफ़र किया। पहली बार स्लीपर बोगी तब देखा था जब हम एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म को जा रहे थे और पवन एक्सप्रेस को पार करना था। मैं जब दसवीं में आया तब मैंने रेलवे ज़ोन के बारे में पूरी तरह से जाना लेकिन मैं उनदिनों भी "शयनयान", पू म रे, वातानुकूलित, तृतीय श्रेणी सब पढ़ लेता था और समझता भी था। गुवाहाटी इसीलिए याद रहता मुझे की मैंने एक इंजन पर लिखा देखा था गुवाहाटी।

        दादी कहती थी जब भी ज़रूरत हो चेन खींचने की ज़रूरत पड़े तो बेझिझक खींचना । जब कोई ट्रेन चढ़ न पाए। कोई समान नीचे रह जाये। सही चीज़ कहने के लिए कभी मत डरना। ये तो पूरी ज़िंदगी की सबक है। पिछले कुछ दिनों से ट्रेन के साथ बहुत लंबा सफ़र रहा। अब प्लेटफॉर्म टिकट 50 का हो गया है। टिकट का रंग सफ़ेद हो गया है। ट्रेन बिजली पर चल रही है। रिक्शे चलाने वाले लोग कम गये हैं। तुर्की स्टेशन पर वो पीपल का पेड़ नहीं है अब जिसके नीचे बैठकर 9 बजिया का इंतिज़ार किया जाए। हाँ, दादी अब हमेशा साथ रहती हैं बताने को। "दौड़कर ट्रेन नहीं पकड़ना है"। 

     कितना कुछ बदल रहा है। कितना कुछ बदल जायेगा। रेल डीज़ल ईंजन से बिजली पर शिफ़्ट हो गयी है। मोदी जी ने ये भी कहा है कुछ दिनों में बुलेट ट्रेन भी चलने लगेगी। सबकुछ बदलता रहेगा। पर बिता हुआ बस वहीं रहता है भले ही वक़्त की कितनी ही पड़त चढ़ जाए। जाए वो यादें क़ब्र में दफ़न हो जायें। उन यादों से हमेशा कोपलें फूटती हैं। यात्राओं में यहीं कोपलें नयी यादें बनाने के लिए हमें ज़िंदा रखती हैं। 

अबतक कौन सी कोपलों ने आपको ज़िंदा रखा है?


@बोज़ो

1 comment:

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