Tuesday, 14 December 2021

उदासी

In frame- Komal Mundhara


     अज़ीब बात है न। थोड़ी देर से पहले वाला जो थोड़ा सा वक़्त था उसमें अचानक से उदासी घिर आयी। ऐसी घिरी जैसे दिन में बादलों ने आसमान घेर कर कहा हो देखो रात वाली अमावस ऐसी होती है। फिर उदासी के इस अमावस में मैंने चाहा कहीं से कोई सुराख़ कर पाऊँ तो उदासी ख़तम हो। सारे उपायों के बाद बस थोड़े देर पहले ख़ुद से सवाल करने लगा। क्या इसबात पर उदास होना चाहिये जिस बात पर मैं उदास हो रहा हूँ? क्या औरों के साथ भी ऐसा होता होगा कि किसी बात पर उदास होकर वो ख़ुद से सवाल करते होंगे। क्यों होना है उदास इन बातों पर? 

      हम कभी कभी इतने अज़ीब होते हैं ख़ुद के लिए सामान्य रहना भी मुश्किल हो जाता है। सामान्य न रहना अज़ीब क्यों है? फिर सोचता हूँ ख़ुश रहना जहाँ संघर्ष सा हो वहाँ उदासी घिर आना स्वीकार्य तो नहीं ही होगा। पर ठीक है। ऐसे उदास दिनों के लिए बहुत सी यादें और क़िस्से हमारे पास होते हैं जिसे साथ बिठाकर रोया जा सकता है नहीं तो कम से कम एक दूसरे को निहारा तो जा सकता है। क्या आपके पास है ऐसे क़िस्से? ऐसी यादें?

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