हिमाचल में आए हुए आज चौथा दिन है। जहां हैं वो भी गांव ही है लेकिन बिहार के गांव जैसा नहीं है। अब एक जैसा होने की बात करना भी बेतुका सा है। गंगा के मैदान की समतल सपाट ज़मीन और हिमालय के पहाड़ों को देखना अपने आप में अलग एहसास है। यहां आसपास पहाड़ से छोटी छोटी जलधारा को आवाज़ दिन रात आती रहती है। चिड़ियों का चहकना शाम को जब बंद होता है तब झींगुर संगीत का जिम्मा ले लेता है। और शाम होते ही तारे दिखने लगते हैं। अनगिनत तारें जिन्हें गिन नहीं सकते। वैसे तारे गिनने के लिए तारों का दिखना जरूरी है जो की यहां मुमकिन हो पा रहा है। ऊपर से दिन में ये रंग बिरंगे पेड़ देखकर लगता है इंद्रधनुष ज़मीन पर शुरू होकर पहाड़ पर दूर तक फैला है। मैं चाहता हूं ये इंद्रधनुष इस पहाड़ से गंगा के समतल तक भी पहुंचे। और दुनिया के हर कोने तक। इस दुनिया को सिर्फ़ एक रंग की नहीं सतरंगी होने की ज़रूरत है।
@बोज़ो
6/05/2024
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