मैंने पूछा "दिवाली छठ में घर नहीं आइएगा?"
वो बोले "नहीं, यहां भी छठ मनता है न, और घर परिवार भी यही है"
मैंने कहा - ठीक है।
अगले ही पल उन्होंने पूछा - तुम कहां से हो?
मैंने आख़िरी चुस्की लेते हुए कहा - मुज़फ्फरपुर से हूं, बिहार से
उन्होंने अगले पल कहा - फतुहा जानते हो, पटना वाला हम वहां जाते आते रहते हैं।
मुझे फतुहा सुनते ही 12th के दिनों का एक दोस्त मंटू याद आया, वो भी फतुहा से था, और अब ऐसे भी मैं जानता हूं इस जगह को। मैंने कहा "हां, जानता हूं मैं, वहीं पटना से अब 2 घंटा लगता है हमारे गांव पहुंचने में"
थोड़ी देर में ही मैं वहां से निकल गया। लेकिन वो पिछले 30 सालों से हैं दिल्ली शहर में यह बात रह गई। मैं सिर्फ़ एक महीने 10 दिन से अपने गांव से दूर हूं, फिर भी लौटने की बेचैनी हो रही है। दिल्ली शहर जगमगा रहा है। मिठाइयां बन रही है। लोग अभी भी सजावट के सामान खरीद रहे हैं। स्वास्तिक बना स्टीकर ख़रीद रहे हैं। दरवाज़े पर सजाने के लिए शुभ लाभ वाला पोस्टर भी ले रहे हैं।
और ठीक इस समय मुझे अपने गांव में केले के दो पेड़ के बीच बांस की फट्टी लगाकर उसपर कुलिया जलाते हुए रमेशवा बाबा याद आ रहे हैं। मोहल्ले में सबसे पहले केले के पेड़ का प्रबंध करके दिया जलाने और लुकियारी में सबसे आगे रहते थे। कल भी ऐसे केले पेड़ ढूंढें जाएंगे शायद।
दीप जल रहा होगा। चढ़ूआँ चौक पर लक्ष्मी पूजा होगा। लालाबाबू के यहां लक्ष्मी पूजा, शिवजी के दुकान पर लक्ष्मी पूजा, राकेश भाई के दुकान पर लक्ष्मी पूजा, संतोष भाई के दुकान पर लक्ष्मी पूजा, अर्जुन भाई की दुकान पर लक्ष्मी पूजा होगा। प्रसाद बंटेंगे। पटाखे जलेंगे। लेकिन वहां बहुत से चाचा और भाई नहीं होंगे जो इस बार छुट्टी नहीं ले पाए किसी और शहर में। या फिर बचा के रखा है छुट्टी ताकि किसी शादी में आ सके।
लेकिन सभी की आत्मा गांव पहुंचेगी। जब कल दीप जलेंगे। जब बच्चों के ख़ुशी से चिल्लाने की आवाज़ कानों में पड़ेगी। और साथ ही कहीं कोई शारदा सिन्हा का गाना बजा ही देगा "कांच ही बांस के बहनगिया, बहगी लचकत जाए"
@Bozo
30 अक्टूबर 2024
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