Wednesday, 29 September 2021

कविताएँ

जब भी शाम होती है,
हर किस्म की कविताएँ दौड़ते हुए आती हैं
जैसे पकड़म पकड़ाई खेलते हुए घर लौटते बच्चे।

कुछ हाफ़तें हुये कहती हैं 
हम यहाँ छुपे, यहाँ भागे
इसको हराया, इससे जीते
इससे प्रेम किया, उनसे डाँट खायी

कुछ पसीने से लथपथ
ज़ोर से साँस लेती रहती हैं
कह नहीं पाती किससे डरकर भागी है,
कौन पीछा कर रहा था।

कुछ यूँ देखती हैं जैसे कह रही हो
अच्छा हुआ शाम हो गयी
"कुछ देर और होती तो शायद हार जाती मैं"
कह नहीं पाती की किसी आंदोलन से होकर आयी है।

कुछ लौटते ही आँखें मूंदे सो जाती हैं
उनके खर्राटें की होती है एक अलग क़िस्म
कभी कभी बंध जाती है घिग्घी,
मानों सपने में ही किसी ने गला दबा दिया हो।

सपने में मर रही कविता को
जब भी बचाता हूँ, अपने अंदर पाता हूँ।


@बोज़ो

विरह

तुम बाढ़ हो सकती थी,
और मैं तुममें डूब चुका धान की फसल,
तुम रहते तो सब कहते मैं डूबा हूँ,
जाते हीं मेरी जगह नयी फसलें आती
और मैं भुला दिया जाता।

तुम अकाल हो सकती थी,
और मैं धरती में पड़ी दरारों में फँसी हुई एक आह, 
तुम्हारे रहते ज़िंदा रहता उम्मीदों की तरह

लेकिन,
मुझे यक़ीन है
तुम आग हो।
और मैं जंगलों से काटकर लाई गयी लकड़ी,
जिसे तुम शामिल करते हो ख़ुद में,
किसी ऑंगन में बनी मिट्टी के चूल्हें में,

तुम्हारे बाद मैं बचता हूँ सिर्फ़ ख़ाक
पर तुम्हारी तपन शामिल रहती है मुझमें
जबतक की मैं किसी खेत की फ़सल में शामिल न हो जाऊँ।

@बोज़ो

#poem #virah #ishq #badh #biharflood #bihar #fire #poetry #shabdalay #shabdahaar #hindinaama #hindipnktiyaan #hindwi #writer #poetry #hindipoetry #bozokikalam

Friday, 24 September 2021

टोपी शुक्ला


इस किताब के बारे में मैं बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ। शुरू से लिखूँ तो भी इस किताब का अंत मेरे 'जेहन' में आने वाले 'अल्फाज' से चिपक गया है। खैर! बिन जाने भी एक अंत तो चिपका रहता है, उनके साथ भी जिनका कोई अंत नहीं। बहुत सी कहानियां कभी 'खत्म' नहीं होतीं। कभी टोपी शुक्ला कोई कहानी जी रहा होता है, कभी हम। कुछ कहानियां अपनी सूरत बदलकर आती हैं आखिर में मालूम पड़ता है अरे! ये तो वही कहानी है जो कल उसकी शक्ल में थी। कभी कभी कुछ कहानियां पुनर्जन्म लेती हैं। "राही मासूम रजा" की ये किताब कईं सारी कहानियों का पुनर्जन्म है।

जबकि मैं इस क़िताब का अंत भी शुरुआत से साथ लिए हुआ हूँ फिर भी आपको उसकी भनक नहीं लगने दूँगा। लेखक ने इतने ही खूबसूरत तरीके से "टोपी शुक्ला यानी पण्डित बलभद्र नारायण शुक्ला" की कहानी लिखी है, सबकुछ शुरू में बतलाने के बाद भी आपको अंत की भनक नहीं लगेगी। वैसे कहानी तो टोपी के जन्म से ही करेंगे। जन्म की सामाजिक सच्चाई को कहते हुए राही साहब ने लिखा है;

"संसार के तमाम छोटे-बड़े लोगों की तरह टोपी भी बेनाम पैदा हुआ था। नाम की जरूरत तो मरनेवालों को होती है। गांधी भी बेनाम पैदा हुए थे गोडसे भी। जन्म लेने के लिए आज तक किसी को नाम की जरूरत नहीं पड़ी है। पैदा तो केवल बच्चे होते हैं। मरते मरते वह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, नास्तिक, हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, गोरे, काले जाने क्या क्या हो जाते हैं।"

टोपी शुक्ला का जन्म पिता डॉक्टर भृगु नारायण शुक्ला नीले तेलवाले और माता रामदुलारी दादी सुभद्रदेवी आगे पीछे दो भाइयों के पीठ के बीच में हुआ। वैसे ये सब चुनना तो टोपी के नसीब में नहीं था नहीं तो टोपी तो चाहता था कि उसके पीठ पर जन्में भाई के बदले एक साइकिल हो जाता तो ठीक था। वैसे जब आप इस कहानी में दाखिल होंगे तब टोपी का दोस्त इफ्फन उसकी बीवी सकीना से भी मिलेंगे। 

बनारस से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कैम्पस और बचे सफर पर आप इस किताब के साथ जाएं। वैसे किताब के कुछ हिस्से हमेशा के लिए रह गए हैं;

"लाश!
यह शब्द कितना घिनौना है! आदमी अपनी मौत से, अपने घर से, अपने बाल-बच्चों के सामने मरता है तब भी आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं और आदमी सड़क पर किसी बलवाई के हाथों मारा जाता है, तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं। भाषा कितनी गरीब होती है! शब्दों का कैसा जबरदस्त काल है! कितनी शर्म की बात है कि हम घर पर मरनेवाले और बलवे में मारे जानेवाले में फर्क नहीं कर सकते जबकि घर पर केवल एक आदमी मरता है और बलवाइयों के हाथों परम्परा मरती है, सभ्यता मरती है, इतिहास मरता है। कबीर की राम की बहुरिया मरती है। जायसी की पद्मावती मरती है। कुतुबन की मृगावती मरती है, सुर की राधा मरती है। वारिस की हीर मरती है। तुलसी के राम मरते हैं। अनीस के हुसैन मरते हैं। कोई लाश के इस अम्बार को नहीं देखता। हम लाशें गिनते हैं। सात आदमी मरे। चौदह दुकानें लूटीं।  दस घर में आग लगा दी गई। जैसे कि घर, दुकान, और आदमी केवल शब्द हैं जिन्हें शब्दकोशों  से निकालकर वातावरण में मँडराने के लिए छोड़ दिया गया हो..."

वैसे मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ कि नौकरी के लिए कोई राजनीतिक टिप्पणी करूँ, हाँ राही साहब ने जो बात कहीं है उससे आपका भी कलेजा निकल ही आएगा;

नौकरी!
सुना जाता है कि पहले जमानों में नौजवान, मुल्क जीतने, लम्बी और कठिन यात्राएँ करने, खानदान का नाम ऊँचा करने के ख्वाब देखा करते थे। अब वे केवल नौकरी का ख्वाब देखते हैं। नौकरी ही हमारे युग का सबसे बड़ा एडवेंचर है! आज फाहियान और इब्ने-बतूता, बास्कोडिगामा और स्काट नौकरी की खोज में लगे रहते हैं। आज के ईसा, मोहम्मद और राम की मंजिल नौकरी ही है।

वैसे आप समझ गए होंगे कि टोपी शुक्ला की कहानी में भी नौकरी की बात भी होगी। वैसे बहुत से किरदार चाहते हैं कि मैं उनका नाम यहीं ले लूँ। लेकिन कहानी के हिसाब से ही आप उनसे मिले तो बेहतर होगा। वैसे एक बात चलते चलते कह दूँ अगर सकीना मेरा लिखा अभी पढ़ रही होती तो लड़ बैठती जैसा वो टोपी से लड़ती है। आप कहानी पढ़े तबतक मैं सकीना से बचने के लिए अपने कुछ शब्दों को ठीक से लिख देता हूँ।

रज़ा।। ज़ेहन।। अल्फ़ाज़।। ख़त्म ।। इफ़्फ़न।। दाख़िल।। सफ़र।। क़िताब।। ग़रीब।। ज़बरदस्त।। फ़र्क।। ज़मानों।। ख़्वाब।।फ़ाहियान।। मंज़िल।। 

★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★

@बोज़ो

Saturday, 18 September 2021

एक चिथड़ा सुख



किताब - एक चिथड़ा सुख
लेखक -निर्मल वर्मा
..............................................................किताब का नाम "एक चिथड़ा सुख" पढ़ते से ही ऐसा लगता है मानों हृदय में सवालों के पेड़ उग आए हों। सुख? चिथड़ा? एक चिथड़ा सुख? ये सुख है भी तो चिथड़ा क्यों है? सुख का अर्थ तो सम्पूर्णता की ओर इंगित करता है, फिर ये किस सुख की बात है?

जब तक कि इन सवालों के पेड़ बिना जवाब के पतझड़ में बदलने लगते हैं आप पढ़ते हैं किताब के मुख्य कवर के पिछले हिस्से पर लिखा एक संवाद-

-तुमनें कभी उसे देखा है
-किसे?
-दुख को... मैंने भी नहीं देखा लेकिन जब तुम्हारी कज़िन यहाँ आती है मैं उसे छिप कर देखती हूँ। वह यहाँ आकर अकेली बैठ जाती है। पता नहीं क्या सोचती है और तब मुझे लगता है, शायद यह दुख है!

तब यकायक लगता है मानों एक जवाब मिलते ही सवालों का एक पेड़ फिर से उग रहा हो। क्या सचमुच में दुख की आकृति, रूप रेखा कैसी होगी?

बिट्टी, इरा, डैरी, डैरी की बहन, नित्ति भाई, और बिट्टी का कज़िन इन सबके जीवन के अपने सवालों के जवाब उम्र के किसी पतझड़ की ताक में हैं। दिल्ली की सड़कों पर न जाने कितने सवालों ने अपने रंग बदल लिए हो मानों एक पत्ता इंद्रधनुष सा पनप गया हो। 

बिट्टी की बरसाती, डैरी का घर, नित्ति भाई का कमरा, निज़ामुद्दीन स्टेशन, बिहार का जंगल और इलाहाबाद सबकुछ अपने में रखें हैं। किसी का सच, किसी का डर, किसी का इंतज़ार, किसी का बचपन, किसी की जवानी, किसी की ज़िन्दगी और शायद किसी की मौत भी। 

किरदारों के बीच के संवाद हर समय सवालों के नये बसंत के साथ साथ हमेशा एक पतझड़ लिए हुए है। 
इस किताब के कुछ अंश नीचे लिख रहा हूँ।

¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥¥

¶कुछ लोग अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखाई देते हैं-उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

¶शायद वे लोग जो शुरू की ज़िन्दगी में बहुत नीचे जाते हैं, वे ऊपर आकर उदासीन हो जाते हैं।

¶कुछ लोग इतने सम्पूर्ण ढंग से अधूरे होते हैं कि अपना अधूरापन पोंगा-सा जान पड़ता है।

¶कुछ लोगों के भीतर झाड़ियाँ उगने लगती है और उनका दिल धीरे धीरे दुनिया से डरकर झाड़ियों में दुबक जाता है, वहीं छिपा रहता है।

¶बीती हुई स्मृति आनेवाली पीड़ा को कभी माफ़ नहीं करती।

देखते हुए हम जो भूल जाते हैं, लिखते हुए वह एक 
बार फिर याद आ जाता है।

ππππππππππππππππππππππππππ

ज़िदगीं भर एक सुख की कामना और उसे पाने की यात्रा निरतंर चलती रहती है। ऐसी न जाने कितनी यात्राएँ हम किसी किताब, डायरी के साथ पूरा करते हैं। ख़त्म होने के बाद भी। कभी कभी किसी पन्ने से यादें टपकने लगती हैं। एक एक बूंद कभी कभार मृत्यु के अनकहे बाढ़ में तब्दील होकर हमें कहते हैं। तुम अबतक ज़िंदा कैसे हो? 

Wednesday, 1 September 2021

हमारा मुखिया कैसा हो?

चलिए! आज आपको एक दुकान में लिए चलता हूँ। कपड़े की दुकान में। पहुँचते ही दुकानदार आपसे पूछता है,
क्या चाहिए? और आपको चाहिए होता है जींस। और आपके जींस कहते ही आगे की बातचीत शुरू होती है।

जिंस के वरायटी में सबसे पहले दुकानदार पूछता है; प्लेन या डिज़ाइन? अगर आपने कहा दिया डिज़ाइन तो सबसे पहले उसका कहना होता है कितना तक चलेगा, डिज़ाइन का रेट थोड़ा हाई है। ये पूछते ही लगता है जैसे दुकानदार कह रहा ज़्यादा अच्छा कपड़ा पहनने की हैसियत है कि नहीं एक बार देख लो क्योंकि महंगी है। अब बात जब भी हैसियत की हो मानवीय गुण कहता है कि मानवीय मन "सामने वाले से हैसियत बड़ी है मेरी" का भरम पैदा करता है। और आप फिर कह देते है अरे आप दिखाओ। 


वो आपको प्लेन जींस के फायदे बताता है और टिकाऊ होने का विश्वास भी दिलाता है। आप पूछते हैं डिस्कलर होगा तो वापस करेंगे जीन्स? वो आपको सारे वादें और फ़ायदे की बातचीत में बता चुका होता है कि वापस तो नहीं होगी जींस। कभी कभी अगर ट्रायल रूम हो और आपने जींस पहनकर देख लिया तो फिटिंग का पता चल जाता है। लेकिन यदि आप हैं जो जींस पहनकर देखना घर पर पसंद करते हैं तो ट्रायल कर ही नहीं पाते। आप दुकानदार की बातों पर भरोसा करते हुए घर लौटते हैं। अगर दुकान के बाहर "बिका हुआ माल वापस नहीं होगा" का बोर्ड लगा हुआ है तो आप अपना जींस ध्यान रखकर ही ख़रीदते हैं कि दुकान से निकलने बाद कैसे भी करके जींस से काम चलाना पड़ेगा।

अब हो सकता है कि आपके पास यही एक जींस है जिसे आपको पाँच साल चलाना है तो क्या करेंगे आप? 

अब पाँच साल सुनते ही आपके मन में बिहार में होने वाला पंचायत चुनाव का ख़याल आ गया होगा। 24 सितम्बर से लेकर 12 दिसम्बर तक 11 चरणों में होने वाले पंचायत चुनाव का बिगुल तो बज चुका है। और अब आपके कानों में बहुत से नेताओं के नये नये उभरते नेताओं की मीठी मीठी आवाज़ कानों में शहद घोल रही होगी। वैसे बिहार में 16 जिला बाढ़ का कहर झेल रहा है 34 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। उनके लिए चुनाव के चरण इस तरह रखे गये हैं कि तबतक बाढ़ की हालत ठीक हो जायेगी। अभी तो गंगा मईया और बूढ़ी गंडक हमसें नाराज़ ही है। 


पूरे बिहार में पंचायत चुनाव के तहत कुल छह पदों मुखिया के 8072, वार्ड सदस्य के 1,13,307, पंचायत समिति सदस्य के 11,104, जिला परिषद सदस्य के 1160, पंच के 1,13,307 व सरपंच के 8072 पदों के लिए चुनाव होगा। 

याद कीजिये कि पिछले चुनाव में जो मुखिया, चुनाव लड़ने के लिये प्रत्याशी हुए थे वे कैसे दुकानदार थे। किस तरह का जींस आपको बेचा उन्होंने। रंग बदला की नहीं? फिट हुआ कि नहीं? वादे के मुताबिक़ चल रहा है या आप बस इंतिज़ार में हैं कि हालत ही तो नया जींस ख़रीद लें। वैसे अभी न थोड़ा बहुत ट्रायल तो सभी प्रत्यासी दे ही रहें हैं।

बात ये है कि जींस की दुकान से आप जींस नहीं खरीदेंगे फिर कोई दूसरा ग्राहक आकर खरीदारी तो करेगा ही। और ये तो चुनाव की दुकान है, हर दुकानदार अपनी क़्वालिटी बताकर बेचता ही रहेगा। तो थोड़ा सा समझिए कि आपको वादे के मुताबिक़ और ज़रूरत के हिसाब से अच्छी फ़ीट एंड फाइन जींस ख़रीदनी है। 

मुखिया पंचायत का एक अहम हिस्सा है। आईए जानते हैं क्या है मुखिया की जिम्मेदारियां -

मुखिया की ज़िम्मेदारियां-

1) ग्राम सभा और ग्राम पंचायत की बैठकें आयोजित करना और उनकी अध्यक्षता करना। एक कैलेंडर वर्ष में कम से कम चार बैठकें आयोजित करना।
2) बैठकों का कार्य-व्यवहार संभालना और उनमें अनुशासन कायम रखना।
3) पूंजी कोष पर विशेष नजर रखना
4) ग्राम पंचायत के कार्यकारी प्रशासन की देख-रेख
5) ग्राम पंचायत में कार्यरत कर्मचारियों की देख-रेख और दिशा निर्देश देना।
7) ग्राम पंचायत की कार्य योजनाओं/प्रस्तावों को लागू करना।
8) नियमानुसार रखी गई विभिन्न रजिस्टरों के रख-रखाव का इंतजाम करना।
9) ग्राम पंचायत के तय किए चंदों, फीसों और टैक्सों की वसूली का इंतजाम।
10) विभिन्न निर्माण कार्यों को कार्यान्वित करने का इंतजाम करना।
11) राज्य सरकार या एक्ट अथवा किसी अन्य कानून के अनुसार सौंपी गई अन्य जिम्मेदारियों और कार्यों को पूरा करना।


मुखिया की ये ज़िम्मेदारियां आपको मालूम होने चाहिए। तभी तो आप जान पायेंगे कौन सी ज़िम्मेदारी निभाई नहीं गयी पहले और कौन सी निभाई जानी चाहिए थी। आपके जीवन में अक्सर ऐसा समय आता है जब बहुत में से एक चुनना होता है। तो याद रहे कि आपकी भी ज़िम्मेदारियां और कर्तव्य क्या हैं। याद रहे आप पाँच साल फिर ये जींस बदल नहीं पायेंगे।

बाक़ी आपको कैसा जींस चाहिए ये बात आपसे बेहतर कोई और नहीं बता सकता। दुकानदार भी नहीं। 


प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...