Wednesday, 29 September 2021

कविताएँ

जब भी शाम होती है,
हर किस्म की कविताएँ दौड़ते हुए आती हैं
जैसे पकड़म पकड़ाई खेलते हुए घर लौटते बच्चे।

कुछ हाफ़तें हुये कहती हैं 
हम यहाँ छुपे, यहाँ भागे
इसको हराया, इससे जीते
इससे प्रेम किया, उनसे डाँट खायी

कुछ पसीने से लथपथ
ज़ोर से साँस लेती रहती हैं
कह नहीं पाती किससे डरकर भागी है,
कौन पीछा कर रहा था।

कुछ यूँ देखती हैं जैसे कह रही हो
अच्छा हुआ शाम हो गयी
"कुछ देर और होती तो शायद हार जाती मैं"
कह नहीं पाती की किसी आंदोलन से होकर आयी है।

कुछ लौटते ही आँखें मूंदे सो जाती हैं
उनके खर्राटें की होती है एक अलग क़िस्म
कभी कभी बंध जाती है घिग्घी,
मानों सपने में ही किसी ने गला दबा दिया हो।

सपने में मर रही कविता को
जब भी बचाता हूँ, अपने अंदर पाता हूँ।


@बोज़ो

विरह

तुम बाढ़ हो सकती थी,
और मैं तुममें डूब चुका धान की फसल,
तुम रहते तो सब कहते मैं डूबा हूँ,
जाते हीं मेरी जगह नयी फसलें आती
और मैं भुला दिया जाता।

तुम अकाल हो सकती थी,
और मैं धरती में पड़ी दरारों में फँसी हुई एक आह, 
तुम्हारे रहते ज़िंदा रहता उम्मीदों की तरह

लेकिन,
मुझे यक़ीन है
तुम आग हो।
और मैं जंगलों से काटकर लाई गयी लकड़ी,
जिसे तुम शामिल करते हो ख़ुद में,
किसी ऑंगन में बनी मिट्टी के चूल्हें में,

तुम्हारे बाद मैं बचता हूँ सिर्फ़ ख़ाक
पर तुम्हारी तपन शामिल रहती है मुझमें
जबतक की मैं किसी खेत की फ़सल में शामिल न हो जाऊँ।

@बोज़ो

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Friday, 24 September 2021

टोपी शुक्ला


इस किताब के बारे में मैं बहुत कुछ लिखना चाह रहा हूँ। शुरू से लिखूँ तो भी इस किताब का अंत मेरे 'जेहन' में आने वाले 'अल्फाज' से चिपक गया है। खैर! बिन जाने भी एक अंत तो चिपका रहता है, उनके साथ भी जिनका कोई अंत नहीं। बहुत सी कहानियां कभी 'खत्म' नहीं होतीं। कभी टोपी शुक्ला कोई कहानी जी रहा होता है, कभी हम। कुछ कहानियां अपनी सूरत बदलकर आती हैं आखिर में मालूम पड़ता है अरे! ये तो वही कहानी है जो कल उसकी शक्ल में थी। कभी कभी कुछ कहानियां पुनर्जन्म लेती हैं। "राही मासूम रजा" की ये किताब कईं सारी कहानियों का पुनर्जन्म है।

जबकि मैं इस क़िताब का अंत भी शुरुआत से साथ लिए हुआ हूँ फिर भी आपको उसकी भनक नहीं लगने दूँगा। लेखक ने इतने ही खूबसूरत तरीके से "टोपी शुक्ला यानी पण्डित बलभद्र नारायण शुक्ला" की कहानी लिखी है, सबकुछ शुरू में बतलाने के बाद भी आपको अंत की भनक नहीं लगेगी। वैसे कहानी तो टोपी के जन्म से ही करेंगे। जन्म की सामाजिक सच्चाई को कहते हुए राही साहब ने लिखा है;

"संसार के तमाम छोटे-बड़े लोगों की तरह टोपी भी बेनाम पैदा हुआ था। नाम की जरूरत तो मरनेवालों को होती है। गांधी भी बेनाम पैदा हुए थे गोडसे भी। जन्म लेने के लिए आज तक किसी को नाम की जरूरत नहीं पड़ी है। पैदा तो केवल बच्चे होते हैं। मरते मरते वह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, नास्तिक, हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, गोरे, काले जाने क्या क्या हो जाते हैं।"

टोपी शुक्ला का जन्म पिता डॉक्टर भृगु नारायण शुक्ला नीले तेलवाले और माता रामदुलारी दादी सुभद्रदेवी आगे पीछे दो भाइयों के पीठ के बीच में हुआ। वैसे ये सब चुनना तो टोपी के नसीब में नहीं था नहीं तो टोपी तो चाहता था कि उसके पीठ पर जन्में भाई के बदले एक साइकिल हो जाता तो ठीक था। वैसे जब आप इस कहानी में दाखिल होंगे तब टोपी का दोस्त इफ्फन उसकी बीवी सकीना से भी मिलेंगे। 

बनारस से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कैम्पस और बचे सफर पर आप इस किताब के साथ जाएं। वैसे किताब के कुछ हिस्से हमेशा के लिए रह गए हैं;

"लाश!
यह शब्द कितना घिनौना है! आदमी अपनी मौत से, अपने घर से, अपने बाल-बच्चों के सामने मरता है तब भी आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं और आदमी सड़क पर किसी बलवाई के हाथों मारा जाता है, तब भी बिना आत्मा के उस बदन को लाश ही कहते हैं। भाषा कितनी गरीब होती है! शब्दों का कैसा जबरदस्त काल है! कितनी शर्म की बात है कि हम घर पर मरनेवाले और बलवे में मारे जानेवाले में फर्क नहीं कर सकते जबकि घर पर केवल एक आदमी मरता है और बलवाइयों के हाथों परम्परा मरती है, सभ्यता मरती है, इतिहास मरता है। कबीर की राम की बहुरिया मरती है। जायसी की पद्मावती मरती है। कुतुबन की मृगावती मरती है, सुर की राधा मरती है। वारिस की हीर मरती है। तुलसी के राम मरते हैं। अनीस के हुसैन मरते हैं। कोई लाश के इस अम्बार को नहीं देखता। हम लाशें गिनते हैं। सात आदमी मरे। चौदह दुकानें लूटीं।  दस घर में आग लगा दी गई। जैसे कि घर, दुकान, और आदमी केवल शब्द हैं जिन्हें शब्दकोशों  से निकालकर वातावरण में मँडराने के लिए छोड़ दिया गया हो..."

वैसे मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ कि नौकरी के लिए कोई राजनीतिक टिप्पणी करूँ, हाँ राही साहब ने जो बात कहीं है उससे आपका भी कलेजा निकल ही आएगा;

नौकरी!
सुना जाता है कि पहले जमानों में नौजवान, मुल्क जीतने, लम्बी और कठिन यात्राएँ करने, खानदान का नाम ऊँचा करने के ख्वाब देखा करते थे। अब वे केवल नौकरी का ख्वाब देखते हैं। नौकरी ही हमारे युग का सबसे बड़ा एडवेंचर है! आज फाहियान और इब्ने-बतूता, बास्कोडिगामा और स्काट नौकरी की खोज में लगे रहते हैं। आज के ईसा, मोहम्मद और राम की मंजिल नौकरी ही है।

वैसे आप समझ गए होंगे कि टोपी शुक्ला की कहानी में भी नौकरी की बात भी होगी। वैसे बहुत से किरदार चाहते हैं कि मैं उनका नाम यहीं ले लूँ। लेकिन कहानी के हिसाब से ही आप उनसे मिले तो बेहतर होगा। वैसे एक बात चलते चलते कह दूँ अगर सकीना मेरा लिखा अभी पढ़ रही होती तो लड़ बैठती जैसा वो टोपी से लड़ती है। आप कहानी पढ़े तबतक मैं सकीना से बचने के लिए अपने कुछ शब्दों को ठीक से लिख देता हूँ।

रज़ा।। ज़ेहन।। अल्फ़ाज़।। ख़त्म ।। इफ़्फ़न।। दाख़िल।। सफ़र।। क़िताब।। ग़रीब।। ज़बरदस्त।। फ़र्क।। ज़मानों।। ख़्वाब।।फ़ाहियान।। मंज़िल।। 

★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★★

@बोज़ो

Saturday, 18 September 2021

एक चिथड़ा सुख



किताब - एक चिथड़ा सुख
लेखक -निर्मल वर्मा
..............................................................किताब का नाम "एक चिथड़ा सुख" पढ़ते से ही ऐसा लगता है मानों हृदय में सवालों के पेड़ उग आए हों। सुख? चिथड़ा? एक चिथड़ा सुख? ये सुख है भी तो चिथड़ा क्यों है? सुख का अर्थ तो सम्पूर्णता की ओर इंगित करता है, फिर ये किस सुख की बात है?

जब तक कि इन सवालों के पेड़ बिना जवाब के पतझड़ में बदलने लगते हैं आप पढ़ते हैं किताब के मुख्य कवर के पिछले हिस्से पर लिखा एक संवाद-

-तुमनें कभी उसे देखा है
-किसे?
-दुख को... मैंने भी नहीं देखा लेकिन जब तुम्हारी कज़िन यहाँ आती है मैं उसे छिप कर देखती हूँ। वह यहाँ आकर अकेली बैठ जाती है। पता नहीं क्या सोचती है और तब मुझे लगता है, शायद यह दुख है!

तब यकायक लगता है मानों एक जवाब मिलते ही सवालों का एक पेड़ फिर से उग रहा हो। क्या सचमुच में दुख की आकृति, रूप रेखा कैसी होगी?

बिट्टी, इरा, डैरी, डैरी की बहन, नित्ति भाई, और बिट्टी का कज़िन इन सबके जीवन के अपने सवालों के जवाब उम्र के किसी पतझड़ की ताक में हैं। दिल्ली की सड़कों पर न जाने कितने सवालों ने अपने रंग बदल लिए हो मानों एक पत्ता इंद्रधनुष सा पनप गया हो। 

बिट्टी की बरसाती, डैरी का घर, नित्ति भाई का कमरा, निज़ामुद्दीन स्टेशन, बिहार का जंगल और इलाहाबाद सबकुछ अपने में रखें हैं। किसी का सच, किसी का डर, किसी का इंतज़ार, किसी का बचपन, किसी की जवानी, किसी की ज़िन्दगी और शायद किसी की मौत भी। 

किरदारों के बीच के संवाद हर समय सवालों के नये बसंत के साथ साथ हमेशा एक पतझड़ लिए हुए है। 
इस किताब के कुछ अंश नीचे लिख रहा हूँ।

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¶कुछ लोग अपने अकेलेपन में काफी सम्पूर्ण दिखाई देते हैं-उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

¶शायद वे लोग जो शुरू की ज़िन्दगी में बहुत नीचे जाते हैं, वे ऊपर आकर उदासीन हो जाते हैं।

¶कुछ लोग इतने सम्पूर्ण ढंग से अधूरे होते हैं कि अपना अधूरापन पोंगा-सा जान पड़ता है।

¶कुछ लोगों के भीतर झाड़ियाँ उगने लगती है और उनका दिल धीरे धीरे दुनिया से डरकर झाड़ियों में दुबक जाता है, वहीं छिपा रहता है।

¶बीती हुई स्मृति आनेवाली पीड़ा को कभी माफ़ नहीं करती।

देखते हुए हम जो भूल जाते हैं, लिखते हुए वह एक 
बार फिर याद आ जाता है।

ππππππππππππππππππππππππππ

ज़िदगीं भर एक सुख की कामना और उसे पाने की यात्रा निरतंर चलती रहती है। ऐसी न जाने कितनी यात्राएँ हम किसी किताब, डायरी के साथ पूरा करते हैं। ख़त्म होने के बाद भी। कभी कभी किसी पन्ने से यादें टपकने लगती हैं। एक एक बूंद कभी कभार मृत्यु के अनकहे बाढ़ में तब्दील होकर हमें कहते हैं। तुम अबतक ज़िंदा कैसे हो? 

Wednesday, 1 September 2021

हमारा मुखिया कैसा हो?

चलिए! आज आपको एक दुकान में लिए चलता हूँ। कपड़े की दुकान में। पहुँचते ही दुकानदार आपसे पूछता है,
क्या चाहिए? और आपको चाहिए होता है जींस। और आपके जींस कहते ही आगे की बातचीत शुरू होती है।

जिंस के वरायटी में सबसे पहले दुकानदार पूछता है; प्लेन या डिज़ाइन? अगर आपने कहा दिया डिज़ाइन तो सबसे पहले उसका कहना होता है कितना तक चलेगा, डिज़ाइन का रेट थोड़ा हाई है। ये पूछते ही लगता है जैसे दुकानदार कह रहा ज़्यादा अच्छा कपड़ा पहनने की हैसियत है कि नहीं एक बार देख लो क्योंकि महंगी है। अब बात जब भी हैसियत की हो मानवीय गुण कहता है कि मानवीय मन "सामने वाले से हैसियत बड़ी है मेरी" का भरम पैदा करता है। और आप फिर कह देते है अरे आप दिखाओ। 


वो आपको प्लेन जींस के फायदे बताता है और टिकाऊ होने का विश्वास भी दिलाता है। आप पूछते हैं डिस्कलर होगा तो वापस करेंगे जीन्स? वो आपको सारे वादें और फ़ायदे की बातचीत में बता चुका होता है कि वापस तो नहीं होगी जींस। कभी कभी अगर ट्रायल रूम हो और आपने जींस पहनकर देख लिया तो फिटिंग का पता चल जाता है। लेकिन यदि आप हैं जो जींस पहनकर देखना घर पर पसंद करते हैं तो ट्रायल कर ही नहीं पाते। आप दुकानदार की बातों पर भरोसा करते हुए घर लौटते हैं। अगर दुकान के बाहर "बिका हुआ माल वापस नहीं होगा" का बोर्ड लगा हुआ है तो आप अपना जींस ध्यान रखकर ही ख़रीदते हैं कि दुकान से निकलने बाद कैसे भी करके जींस से काम चलाना पड़ेगा।

अब हो सकता है कि आपके पास यही एक जींस है जिसे आपको पाँच साल चलाना है तो क्या करेंगे आप? 

अब पाँच साल सुनते ही आपके मन में बिहार में होने वाला पंचायत चुनाव का ख़याल आ गया होगा। 24 सितम्बर से लेकर 12 दिसम्बर तक 11 चरणों में होने वाले पंचायत चुनाव का बिगुल तो बज चुका है। और अब आपके कानों में बहुत से नेताओं के नये नये उभरते नेताओं की मीठी मीठी आवाज़ कानों में शहद घोल रही होगी। वैसे बिहार में 16 जिला बाढ़ का कहर झेल रहा है 34 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। उनके लिए चुनाव के चरण इस तरह रखे गये हैं कि तबतक बाढ़ की हालत ठीक हो जायेगी। अभी तो गंगा मईया और बूढ़ी गंडक हमसें नाराज़ ही है। 


पूरे बिहार में पंचायत चुनाव के तहत कुल छह पदों मुखिया के 8072, वार्ड सदस्य के 1,13,307, पंचायत समिति सदस्य के 11,104, जिला परिषद सदस्य के 1160, पंच के 1,13,307 व सरपंच के 8072 पदों के लिए चुनाव होगा। 

याद कीजिये कि पिछले चुनाव में जो मुखिया, चुनाव लड़ने के लिये प्रत्याशी हुए थे वे कैसे दुकानदार थे। किस तरह का जींस आपको बेचा उन्होंने। रंग बदला की नहीं? फिट हुआ कि नहीं? वादे के मुताबिक़ चल रहा है या आप बस इंतिज़ार में हैं कि हालत ही तो नया जींस ख़रीद लें। वैसे अभी न थोड़ा बहुत ट्रायल तो सभी प्रत्यासी दे ही रहें हैं।

बात ये है कि जींस की दुकान से आप जींस नहीं खरीदेंगे फिर कोई दूसरा ग्राहक आकर खरीदारी तो करेगा ही। और ये तो चुनाव की दुकान है, हर दुकानदार अपनी क़्वालिटी बताकर बेचता ही रहेगा। तो थोड़ा सा समझिए कि आपको वादे के मुताबिक़ और ज़रूरत के हिसाब से अच्छी फ़ीट एंड फाइन जींस ख़रीदनी है। 

मुखिया पंचायत का एक अहम हिस्सा है। आईए जानते हैं क्या है मुखिया की जिम्मेदारियां -

मुखिया की ज़िम्मेदारियां-

1) ग्राम सभा और ग्राम पंचायत की बैठकें आयोजित करना और उनकी अध्यक्षता करना। एक कैलेंडर वर्ष में कम से कम चार बैठकें आयोजित करना।
2) बैठकों का कार्य-व्यवहार संभालना और उनमें अनुशासन कायम रखना।
3) पूंजी कोष पर विशेष नजर रखना
4) ग्राम पंचायत के कार्यकारी प्रशासन की देख-रेख
5) ग्राम पंचायत में कार्यरत कर्मचारियों की देख-रेख और दिशा निर्देश देना।
7) ग्राम पंचायत की कार्य योजनाओं/प्रस्तावों को लागू करना।
8) नियमानुसार रखी गई विभिन्न रजिस्टरों के रख-रखाव का इंतजाम करना।
9) ग्राम पंचायत के तय किए चंदों, फीसों और टैक्सों की वसूली का इंतजाम।
10) विभिन्न निर्माण कार्यों को कार्यान्वित करने का इंतजाम करना।
11) राज्य सरकार या एक्ट अथवा किसी अन्य कानून के अनुसार सौंपी गई अन्य जिम्मेदारियों और कार्यों को पूरा करना।


मुखिया की ये ज़िम्मेदारियां आपको मालूम होने चाहिए। तभी तो आप जान पायेंगे कौन सी ज़िम्मेदारी निभाई नहीं गयी पहले और कौन सी निभाई जानी चाहिए थी। आपके जीवन में अक्सर ऐसा समय आता है जब बहुत में से एक चुनना होता है। तो याद रहे कि आपकी भी ज़िम्मेदारियां और कर्तव्य क्या हैं। याद रहे आप पाँच साल फिर ये जींस बदल नहीं पायेंगे।

बाक़ी आपको कैसा जींस चाहिए ये बात आपसे बेहतर कोई और नहीं बता सकता। दुकानदार भी नहीं। 


Saturday, 28 August 2021

डूबता सूरज

 इससे पहले काविश को इतने ध्यान से नहीं सुना था।  रात के 1 बजने को है। बिन मतलब बस लिखने को लिखना शुरू किया है। कितना अज़ीब है हर बात में मतलब ढूंढ़ना भी तो ठीक नहीं। जैसे रिश्तों में। जैसे बच्चों की हसीं में। जैसे किसी को बिन कुछ कहे देखने में। जैसे इस तस्वीर में डूबते हुए सूरज का मतलब क्या है। इतनी रात गये जगने का मतलब। बाढ़ के आने का मतलब। आसमां के बादलों का पानी में दिखने का मतलब। हर लिखे में तुम्हारा ख़याल आने का मतलब।


ऐसा नहीं लगता जैसे कभी कभी बिन सवाल किये भी साँसें चलती रहनी चाहिये। भले ही इंसान ज़िंदा न हो कम से कम ज़िंदा होने का भरम तो लगा रहे। ऐसे मुझे अभी नहीं पता कि काविश का दूसरा गाना "तेरे प्यार में" भी खूबसूरत लग रहा है। 


गाँव के निचले हिस्से में जिनका घर है उनके घरों में पानी आ चुका है। मैं सोचता हूँ ये पानी हर आकार में ढल सकते हैं तो ऐसा क्यों नहीं करते कि सिर्फ़ वही रास्ता लेते जो एक खूबसूरत दृश्य बनाता हमेशा। फिर मैं सोचता हूँ ये आंखों का पानी भी तो भीतर की ओर हृदय तक बहता होगा और उसका परावर्तित अंश बाहर गालों से होते हुए हवाओं में सुख जाता है। पर अंदर की ओर बहने वाले उस पानी तक तो कोई सूरज की रोशनी नहीं पहुँचती। 


 बाहर का पानी हवाओं के स्पर्श से भी सुख जाता है और अंदर तक रोशनी भी मयस्सर नहीं। जिन घरों में पानी हैं वो बाढ़ के ख़तम होने के इंतिज़ार में कुछ महीने गुज़ार ही लेंगे। खेतों में आया बाढ़ पूरा का पूरा आईना बन चमकता है। दिन में आसमां भी उतर आता है नीचे। कभी कभी कुछ बादल कुछ बची हुई फसलों को देख तन्हा नहीं रहने देती, बरस जाता हैं। शायद बादलों को पता है अकेले ज़िंदा रहना अकेले मर जाने से भी भयानक है। 



पिछली शाम जब ये डूबता सूरज दिख रहा था लगा सिर्फ़ सूरज डूबता रहता तो इतना अज़ीब नहीं लगना था। सूरज के डूबने के साथ पूरी रात के लिए डूब जाते हैं पेड़ों के पत्तो की हरियाली, चिड़ियों की उड़ान, बच्चों के खेल और लगता है मानों रात भर इन डूबे हुए हरियाली, उड़ान और खेल से कोई गीत गा रहा हो।


अभी काविश का गाना बदल कर मैंने बंदिश बैंडिट का "विरह" लगा दिया है।

Thursday, 3 December 2020

भोपाल गैस त्रासदी

जब हम किसी का ज़िक्र करते हैं वो फिर से उस कहानी को जीते हैं। इसीलिए सबसे पहले माफ़ी चाहूँगा सभी रूहों से जो हिस्सा रही हैं "भोपाल गैस त्रासदी" की। 10th क्लास में ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन सही करने के एक नंबर मिलते थे। हमनें और हमारे दोस्तों ने आसानी से याद करके खुश हो गए थे कि एक नम्बर कहीं नहीं गया। सवाल था "भोपाल गैस त्रासदी" में कौन सा गैस ज़िम्मेदार था? "मिथाइल इसोसायनेट" वो भी ये सवाल रसायन विज्ञान का था। कहीं कहीं ऐसे भी पूछते थे कि MIC का फुलफॉर्म क्या है? मिथाइल इसोसायनेट को हमेशा से ज़िम्मेदार की तरह याद किया हमनें। वैसे भी किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में ख़ासकर  ऑब्जेक्टिव क्वेश्चन में यह आसानी से पूछ लिया जाता है। आज 8 सालों बाद मुझे फिजिक्स में पढ़ा न्यूटन के नियम में से प्रथम गति नियम "कोई भी वस्तु अपनी गति की अवस्था बनाये रखता है जबतक की उसपर कोई बाहरी असन्तुलित बल(unbalanced force)  कार्य न करें" याद हो आया है। 

जिसे भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार मानते आया हूँ वो कहाँ था? मैं ये सवाल फिजिक्स के नियम से ही पूछ रहा हूँ। कौन था असन्तुलित बल? किसी एंगल से लगा था वह बल? मेरे एक लेख लिखने से सवालों का ज़वाब तो नहीं मिलेगा लेकिन ये सवाल 1984 से हर दिन पूछे जाते रहे हैं। मगर ज़वाब कौन दे? मिथाइल इसोसायनेट ने तो उत्तर में "बाहरी असन्तुलित बल" 2 दिसम्बर की रात ही दे चुका है। लेकिन वो बाहरी असन्तुलित बल  ऐसे बल है जिनकी अपनी मर्ज़ी है ज़वाब दे या न दें। वैसे किसी भी न्याय और आंदोलन की पहली शर्त है धैर्य।

 आप सबको सनी देओल का वो डायलॉग याद होगा "तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़ मिलती है जज साहब पर इंसाफ़ नहीं मिलता"। ये डायलॉग अच्छी लगी इसीलिए आपको भी बता दिया। मैं ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा बस इतना ही कि वो एक नम्बर का जो सवाल है न कसम से अगर याद रहे तो किसी का एक नम्बर से कोई नौकरी न छूटे। लेकिन दोस्त कभी जब भोपाल जाने का मौका मिले तो उस ज़गह को देखो। जिससे तुम्हें एक नम्बर तुम्हारे एग्जाम में मिला है। अभी भी  2 दिसम्बर की वो रात तुम्हें बहुत सारे ज़वाब देगी। हाँ, पर तुम सवाल मत पूछना किसी से नहीं तो क्या पता कौन सा बाहरी बल तुम्हारी नौकरी को गति की अवस्था से विराम की अवस्था में ले आये।

"भोपाल गैस त्रासदी" के बारे में जानने के लिए बहुत से स्रोत है आज इंटरनेट पर। लेकिन वास्तविकता और समाचार कभी कभी नदी के दो किनारे हो जाते है। और इन दो किनारों के बीच न जाने कितने दशक बहते चले जाते हैं, बिना किसी किनारे पर गए हुए। जिस रोज़ दोनों किनारों को जोड़ती हुई कोई पुलिया बन जाएगी। भोपाल गैस त्रासदी किसी परीक्षा के सवाल से उठकर पूरे समाज का सवाल बनकर खड़ा हो जाएगा। 

चित्र स्रोत- गूूूगल






Thursday, 8 October 2020

बधाई हो! राजनीति हुई है...

बधाई हो! अपने अपने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा करने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों को। हारने की कम सम्भावनाओं वाले क्षेत्र से नॉमिनेशन कराना अपने आप में बहुत बड़ा काम है। (देश के विकास से भी ज़्यादा बड़ा काम)

बधाई हो! उन्हें भी जिन्हें टिकट नहीं मिली। भगवान ने जो किस्मत में लिखा है, उसे आपकी पार्टी के लोग भी नहीं बदल सकतें। अब आपका नाम आपकी पार्टी ने ही नहीं दिया, मैं ऐसा इल्ज़ाम नहीं लगा सकता।

 बधाई हो! जिनके चाहने वालों को टिकट मिली। वैसे भी राजनीति में हम लीडर नहीं अपना रिश्तेदार चुनते हैं। जिन्हें शादियों में बुलाने का सुख प्राप्त हो सके। हालांकि यह सुख न मिलपाने वाले लोगों के साथ मेरी सहानुभूति है।

बधाई हो! जिन्हें यह यक़ीन है कि उसका विपक्ष तो पक्का ही हारेगा भले ही वो ख़ुद जीते न जीते। वैसे भी अपने किये गए कामों के दमपर चुनाव लड़ा होता तभी तो आपको बुरा लगता।

बधाई हो! उन सभी कार्यकर्ताओं को जिनके गाड़ी में डलेंगे पेट्रोल मिलेगा नाश्ता। (वैसे भी बहुत सस्ती पेट्रोल है थोड़ा ज़्यादा डला लीजिएगा, चुनाव बाद भी पेट्रोल बचा रहा तो मार्केट से एक दो बार 80 रुपये किलो परवल ख़रीदने जाने के लिए काम तो आ ही जायेगा)।

बधाई हो! उन सभी प्रेमिकाओं को जिनके प्रेमी चुनाव प्रचार के बहाने उसके मोहल्ले में आएंगे। (यक़ीन मानिए आपके प्रेमी में एक भावी नेता है, लेकिन जिस छत्रछाया में है उसे नेता जी के रहने तक तो कोई सीट नहीं मिलनी, नेताजी के बाद उम्मीदवार बने यह तभी हो सकेगा जब नेताजी के ख़ानदान में कोई न हो तो)

बधाई हो! उन परिवारों को जिनका बोझ कुछ दिनों के लिए कमेगा। इस बेरोज़गारी में कम से कम गाँव के चाचा के लिए चुनाव प्रसार के लायक तो है हमारा बच्चा। (वैसे आपका बच्चा और भी बहुत से चीज़ों के लायक़ हो सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि जिस चचा के लिए आप भेज रहे हैं अपने बच्चे को, शायद ही वो चाहते होंगे कि आपका बच्चा कुछ अच्छा कर जाए, वैसे एक प्रचारक खो जाने का दुख न आपसे देखा जाएगा न नेताजी से।)
 
 बधाई हो! उन टेलर्स को जिनके यहाँ बढ़ेंगे ऑर्डर्स ख़ास क़िस्म के कपड़ों के लिए। जिनमें बनाया जायेगा ख़ास किस्म का जादुई जेब। जिस जादुई जेब में सबकुक रखा जा सकेगा। (मुकदमा, ठेकेदारी, शिक्षा, उम्मीद और आने वाले पाँच साल)।

बधाई हो! उन शिक्षकों को जिन्हें बच्चों को पढ़ाने के बदले मिलेगी इलेक्शन ड्यूटी। स्कूल में बच्चे आपको बहुत मिस करेंगे फिर भी अपने कर्तव्य का पालन करना आपसे ही सीखेंगे। (बस मुझे इस बात का बुरा लग रहा है, कि बूथ पर आप स्वेटर नहीं बुन पाएंगे।)


बधाई हो! उन सभी को जो पहली बार अपना वोट देंगे। उन्हें अपने नाख़ून पर लगने वाले स्याही के लिए बहुत बहुत बधाई। यह स्याही नेल पॉलिश से भी ज़्यादा गहरा शृंगार है। देखिएगा अपने आप को किसी ऐसे व्यक्ति को मत सौंप दीजिएगा जो शादी के वक़्त बड़ी बड़ी बातें करके सारी उम्र देहज़ के लिए आपको दिन रात मरता पीटता रहे और आप बाकियों के कहने पर यह गीत गाते रहे "भला है बुरा है, मेरा पति मेरा देवता है।"

बधाई हो! उन बुजुर्गों को जिनका वृद्धा पेंशन सालों से भले ही बंद हो, भले ही डॉक्टर के पास जाने की हालत न हो, उन्हें  रिक्शा से ले जाया जाएगा, इस आत्मीयत सुख की होने वाली प्राप्ति के लिए बधाई। 

बधाई हो! गाँव की उन सभी नई दुल्हनों को जिनके नाम के साथ "कुमारी" के बदले "देवी" लगा हुआ नया वोटर आईडी कार्ड मिला है वो भी सिर्फ़ दस दिनों में। (आगे आने वाले दिनों में किसी अन्य सुविधाओं के लिए नेताओं के महूर्त का इन्तिज़ार करना पड़ेगा)

बधाई हो! उन सड़कों उन गलियों को जिसपर प्रचार वाले वाहन बहुत प्यार से धीरे धीरे अपनी उपस्थिति दर्ज़ करेंगे। जहाँ से ठीक पाँच साल बाद गुज़रेगा कोई व्यक्ति एक भीड़ के साथ, सबकुक बदलदेने के वादे से।

बधाई हो! बिजली के उन खम्बों को जिनपर पुरानी हो चुकी किसी कोचिंग के प्रचार का पोस्टर हटाकर लगेंगे नये पोस्टर। किताबों के मानचित्रों से ज़्यादा ख़ूबसरत अलग अलग पार्टियों के चुनाव चिन्ह दिखाई देंगे। (किताबों से याद आया आपके गाँव में सरकारी स्कूल का क्या हाल है, सरकारी से मेरा मतलब केंद्रीय विद्यालय से बिल्कुल भी नहीं है।)

बधाई हो! अनाजों को जो बने थे सिर्फ़ किसी मँहगे दर पर बिकने के लिए, इसबार जायेंगे किसी भूखे की पेट में। बधाई उन मुर्गों को जो जिये एक साथ और एक साथ ही परोसे जाएंगे पूरे समाज को, पूरे प्रखंड को, पूरे जिले को वोटिंग डे के ठीक कुछ दिन पहले, उन्हें मरने तक कि एकता के लिए बधाई। 

बधाई हो! उन शराबों को जो छिपे रह जाते बिना ख़रीदार के। लेकिन एक एक कार्टून, एक साथ चुनेंगे एक एक मोहल्ला और दर्ज़ करेंगे अपनी उपस्थिति। रातों में पीकर अपनी ही पत्नी को थप्पड़ मारते हुए कोई कहता हुआ मिलेगा "सुन ई ले पर्चा और ये जो चुनाव चिन्ह है इसी पर देना वोट नहीं तो चमड़ी उधेड़ देंगे। शराब के इस बेहतरीन प्रभाव के लिए सभी क़िस्म के शराबों को बधाई।

बधाई हो! समाज के सभी कुत्तों को। जो फ़िराक़ में थे किसी बड़े भोज के। किसी थाली में बच गई "कलेजी" और "लेग पीस" को चबाकर भौकेंगे एक ही धुन में। सभी को लगेगा ये कुत्ते भौंक नहीं रहे बल्कि मालिक की वफ़ादारी में दूम हिलाते हुए नारा लगा रहे हैं।

हो सकता है आप इस लेख में ख़ुद को न पाएं। इस ग़लती के लिए मुझे माफ़ कीजियेगा। मैं चुनाव प्रसार में इतना व्यस्त हूँ कि आपके बारे में लिखना भूल गया। अरे! गुस्सा छोड़िये और प्यार से इस त्योहार का उत्सव मनाइए। एक दूसरे को बधाई स्वरूप ज़रूर एक संदेश भेजिए;-
बधाई हो! राजनीति हुई है।


Tuesday, 6 October 2020

हम प्रेम को नहीं नकार सकतें

 जब भी कोई मुझसे ये पूछता है कि गाँधीजी के किन विचारों को मानते हैं आप? तो घबरा जाता हूँ। क्या जवाब दूँ मैं। सत्य, अहिंसा, न्याय, सर्व धर्म सम्भाव ऐसे बहुत से शब्द ज़ुबान पर आते हैं और सामने वाले को गाँधीजी के प्रति मेरा लगाव ठीक ठीक पता हो आता है। दरअसल मैं इस प्रश्न से हमेशा भागना चाहता हूँ। क्योंकि मुझे मालूम नहीं कि मेरे अंदर ऐसे कौन एक आधा गुण भी है जो गाँधीजी के कहे हुए किन्हीं विचारों से मिलता जुलता है। फिर मुझे सबसे आसान लगता है अपने बचपन में दौड़कर भागना। 



जहाँ दादी, माँ, पापा, भैया, मामा, मौसी सबके सब मुझे टुकड़ों टुकड़ों में जवाब देने लगते हैं। दादी ने हमेशा किसी को ग़लत करते देख लड़ी उनसे फिर भी मौक़ा पड़ने पर मदद के लिए तैयार रही (हालांकि मैं इतना स्वार्थी हूँ कि मैं किसी के लिए भी सही समय पड़ काम नहीं आता)... किसी को भी माफ़ करने का गुण माँ के पास जितना है उसका कुछ प्रतिशत भी मुझमें हो तो मैं बेहद ख़ूबसरत इंसान हो जाऊँगा। पापा ने दूसरों के लिए कभी बुरा न सोचना भरा है मुझमें,भईया ने उन्मुक्तता भरी है मुझमें समानता और जातिपात को तोड़ने को कभी नहीं कहा बस उनको देखकर अपने आप ही आ गया। मामा, मौसी से मुस्कुराहट सीखना अभी भी कम पड़ता है मुझे।
झूठ न बोलना, लोगों की मदद करना, ग़लत के लिए सवाल करना, प्रेम करना ये तो घर से ही सिखाया जाता है बच्चों को। हाँ, माँ ने किसी से भी लड़ाई झगड़ा न करना भी हमेशा कहती रहीं है। वो तो 2 अक्टूबर को छुट्टी होती थी, तो बापू के नाम याद हो आया, पैसे पर देखा तो बापू याद रहें। तब नहीं मालूम था कि कौन हैं गाँधीजी, हालांकि मुझे यह स्वीकार करते हुए झिझक नहीं है कि मैं अभी भी नहीं जानता उनके बारे में। हाँ, लेकिन अपने परिवार को तो जानता हूँ। हम अपने माँ को जानते हैं।
अब आख़िरी बात जिसे कहने के लिए ऊपर का ताना बाना बुना वह यह है कि हम भले ही किसी को मानो या न मानों। सभी महापुरुषों को भूलकर(बस मानने को कह रहा) इतना सोचिये हम अपने बच्चे को क्या सिखाना चाहते हैं। क्या बनाना चाहते हैं। अगर इसका ज़वाब एक "बेहतर इंसान" होगा तो हम सत्य, प्रेम, न्याय, भाईचारा, वसुधैव कुटुम्बकम को शामिल करेंगे ही करेंगे। तो बस इतना कहना है कि गांधी को नकारना है खुले मन से नकारिये। किसी को भी नकारना है नकारिये। लेकिन आप अपने आपको नहीं नकार सकते, आप परिवार को नहीं नकार सकतें, हम प्रेम को नहीं नकार सकतें
देश में किसी भी विचारधारा के लिए आपके नफ़रत के प्रदर्शन से ज़्यादा ज़रूरी है हमारे घरों से बच्चों के लिए एक नई शुरुआत करना। उन्हें किसी भी महापुरुष का नाम नहीं पता, वो नहीं जानते हमारे अलावा किसी को, हम यानी परिवार ही दुनिया है उनकी। अब हमारी दुनिया में क्या क्या है हमें देखना होगा। सोचना होगा और काम करना होगा।

चित्र श्रेय- 😍
Aneesh Thillenkery
bhaiya

Monday, 14 September 2020

"हिंदी दिवस"

कभी भी,
जन्मदिन मनाने में 
शामिल नहीं होता किसी और के 
मृत्यु का मज़ाक 
या किसी और के जन्म से द्वेष

उत्सव में
मुँह नहीं चिढ़ाते पटाखें
बीते रंगों के त्योहार को

किसी से प्रेम करना
किसी से ईर्ष्या का 
विलोम नहीं हो सकता

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#Hindidiwas #hindi #celebration #bozokikalam #bozo #14september

Sunday, 6 September 2020

ये दिन याद बहुत आएंगे..

यार!
ये दिन याद बहुत आएंगे....

कितना कुछ जिया है न, 
हमनें इस पड़ाव में
लंच, शिवानी, सब यादें,
उस पेड़ की छाव में
वो ड्राफ्टर का डब्बा, 
वो रोलर की रोलिंग
बंक मारने पर धमकी, 
करूँ पैरेंट्स को कॉलिंग
MP नगर का चौराहा, 
वही अब भी है पिपलानी
दोस्तों के चक्कर में यारों 
बन जाते थे दानी
लेक व्यू की लहरें कहेंगी, 
कहाँ गई वो टोली ?
जिसके होने से थी रंगत
दुनिया थी रंगोली,
कितना भी समेटें यादें 
समेट नहीं पाएंगे,
यार!
ये दिन याद बहुत आएंगे, 
याद बहुत आएंगे

रातों को देखेंगे तारें,
टेकरी की याद सताएगी
तुम्हारा दोस्त अच्छा है, 
हमकों कौन बताएगी
अभिव्यक्ति का झूला,
ऊचें से हमको पुकारेगा
बर्थडे पर विश से पहले,
GPL कौन मरेगा
महंगे कॉफी मिलने पर 
भी यादव की याद आएगी
सारे काम, सारी दुनिया,
 यादों में रुक जाएगी
हाथों में हम चाय लिए
रोते भी मुस्काएँगे
यार! 
ये दिन याद बहुत आएंगे, 
याद बहुत आएंगे...

@बोज़ो

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...