Tuesday, 21 December 2021

लौटना


लौटना!
जैसे लौटते हैं बच्चें
शाम ढले,
झाड़ते हैं कपड़े से धूल
छुपाते हैं दोस्तों से दी गईं खरोंचें
ढूंढ़ते हैं घर में ताक पर रखी आलपिन
टूटे हुए बटन के लिए,
"कल चिंटू को देख लूँगा" का ख़्वाब
चेहरे के पीछे कहीं गुस्से में रहता है रोता
पर हर बार रहती है घर लौटने की ख़ुशी

ऐसे ही लौटना,
जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था।

तुम जब भी लौटना,
एक बच्चे की तरह लौटना
सयाने होने के बाद भी...

@बोज़ो
21 दिसम्बर 2021

#poem #returning #bozokikalam #life #childhood

Friday, 17 December 2021

अलग-अलग

कभी कभी दो अलग चीजें अलग अलग जगह होती हैं और जब उनसे अलग अलग जगहों पर मिलते हैं तो लगता है जैसे उतनी अलग बातें नहीं हैं बस अलग रहने मात्र से ही जो अंतर आया है इससे लग रहा ये दो एक ही जैसी चीजें अलग अलग हैं। पर कितना सच है न जो अलग-अलग चीजें अलग-अलग रहकर भी एक जैसे, एक ही सकते हैं और कभी एक सी चीज़ें एक जगह पर भी अलग-अलग रहतीं हैं। इतनी अलग की पीठ और पेट के बीच जैसी दूरी हो जाती है। बाकी अभी सुबह के चार बजने वाले हैं और लैपटॉप पर यूट्यूब सजेशन में गाना चल पड़ा है....जाने तेरे शहर का क्या इरादा है, आसमान कम परिंदें ज़्यादा है...

#different #ishq #love #waiting #bozo #bozokikalam 

Tuesday, 14 December 2021

उदासी

In frame- Komal Mundhara


     अज़ीब बात है न। थोड़ी देर से पहले वाला जो थोड़ा सा वक़्त था उसमें अचानक से उदासी घिर आयी। ऐसी घिरी जैसे दिन में बादलों ने आसमान घेर कर कहा हो देखो रात वाली अमावस ऐसी होती है। फिर उदासी के इस अमावस में मैंने चाहा कहीं से कोई सुराख़ कर पाऊँ तो उदासी ख़तम हो। सारे उपायों के बाद बस थोड़े देर पहले ख़ुद से सवाल करने लगा। क्या इसबात पर उदास होना चाहिये जिस बात पर मैं उदास हो रहा हूँ? क्या औरों के साथ भी ऐसा होता होगा कि किसी बात पर उदास होकर वो ख़ुद से सवाल करते होंगे। क्यों होना है उदास इन बातों पर? 

      हम कभी कभी इतने अज़ीब होते हैं ख़ुद के लिए सामान्य रहना भी मुश्किल हो जाता है। सामान्य न रहना अज़ीब क्यों है? फिर सोचता हूँ ख़ुश रहना जहाँ संघर्ष सा हो वहाँ उदासी घिर आना स्वीकार्य तो नहीं ही होगा। पर ठीक है। ऐसे उदास दिनों के लिए बहुत सी यादें और क़िस्से हमारे पास होते हैं जिसे साथ बिठाकर रोया जा सकता है नहीं तो कम से कम एक दूसरे को निहारा तो जा सकता है। क्या आपके पास है ऐसे क़िस्से? ऐसी यादें?

Friday, 10 December 2021

आम शादियों ने लिखी प्रधानमंत्री जी को चिट्ठी

डिअर प्रधानमंत्री जी!

कोमल चरणों में हम "आम शादी बिरादरी" का सादर प्रणाम स्वीकार कीजिये। हम सब कुशल नहीं हैं और नहीं हमारे होने से कुछ भी मंगल है। तो इधर का बहुत कुछ आपसे बतियाना है। आप स्वस्थ्य तन्दरुस्त और पहले से बेहतर हो यहीं कामना है। 

देखिए! आपको भी पता है शादियों का सीज़न अपने चरम सीमा पर है। जिधर देखिए फेसबुक व्हाट्सएप पर शादियां ही शादियां चल रही हैं लेकिन हमें अपने बिरादरी के शादियों से हमदर्दी है। चाहे आम शादियों में कितनी ही शिकायतें हों। दहेज़ के लिए लड़की वाले का ज़मीन बिक गया हो या 5 लाख का कर्ज़ हो गया हो। बाराती में डांस करने के लिए गौआँ (Vilagers) और बाराती के बीच मार हो गया हो। या फिर दूल्हे के जीजा अपने टाइम का बाक़ी दहेज़ के लिए नखरा करके नाराज़ हो गए हों। या की बड़की भौजी बीयूटी पार्लर न जा पाने के लिए नाराज़ हो। या की 200 की जगह 300 बाराती पहुँच जाने की वज़ह से खाना कम जाने की समस्या हो। मंडप पर लड़का पक्ष से मनचाहा गहना न चढ़ाया गया हो। इंजीनियर लड़का के नाम पर राशन की दुकान चलाने वाले लड़के से शादी हो रही हो। ये सारी शादियां हमारी बिरादरी के हैं "आम शादियां"।

आपने भी रामानंद सागर कृत "रामायण" देखा होगा। उसमें श्रीराम जी ने कितने सुंदर तरीक़े से बाण पर प्रत्यंचा चढ़ाया और बाण टूट गया। श्रीराम और माता सीता की शादी हुई। ये सदियों पहले की बात है इसीलिए थोड़ी सी भी ग़लती हो हमसें तो हमें क्षमा कर दें। श्रीरामचंद्र जी और माता सीता की शादी आम शादियों में से एक नहीं थी। सदियों से हम शादियों को उस शादी को प्रेरणा मानकर सफ़ल होने की प्रार्थना की जाती है। इनदिनों ऐसी शादियां तो कल्पना में ख़ुश रहने के लिए है। देखिए न अब तो त्रेता युग है नहीं कलयुग हैं। हर घर है रावण बैठा इतने राम कहाँ से लाऊँ वाली बात है। 

    हर बच्चा जिसे पढ़ने के लिए संसाधन उपलब्ध है वो अपनी पूरी ज़िंदगी अच्छे से पढ़ाई करने में गुज़ार रहा कि नौकरी मिल जाये। तो शादी की योग्यता पूरी हो। पहले हम आम शादियां भी काफ़ी ख़ुश रहती थीं। सरकारी नौकरी वाली शादियों में हमारा रुतबा रहता था। पर जब से प्राइवेटाईज़ेशन ज़ोरो शोरों से बढ़ रहा है बड़ा डर लगा रहता है। ऊपर से तो 2018 में हुए एग्जाम के रिजल्ट अभी भी पेंडिंग में हैं। बच्चे लुसेंट की किताबें लेकर सोते जागते हमारा सपना देखते हैं। बहुत से बच्चे जो सरकारी नौकरी करके शादी करके किसी के साथ घर बसाने का सपना लिए थे उनमें से बहुत से बच्चे प्रेमिका के बच्चे को 200 रुपये महीने ट्यूशन फ़ी लेकर पढ़ा रहे हैं। उन्हें अभी भी अपनी पूर्व प्रेमिका की बात पर यक़ीन है "हमसे बेहतर लड़की मिलेगी तुम्हें", ज़िस्म भले ही दूर है पर रूह हमेशा से तुम्हारा है। 
    
    फ़ॉर्म भरने के लिए बेरोज़गार बच्चे अगल बगल से कर्ज़े ले रहें हैं। कहीं एग्जाम सेंटर दूर हो गया तो बाइक से जाने का सोचते हैं लेकिन पेट्रोल का दाम  देखकर रोने लगते हैं। उनको रोता देखकर हमें विदाई में फूट फूट कर रोती हुई माएँ याद आती हैं। हमारा मन करता है कि हम होने ही नहीं चाहिए थे। इतना दुःख होता है। हम सबको लगता है महँगाई भी जब ऐसे बच्चों को रोते देखती होगी तो कालेज़ा फट जाता होगा।

  माफ़ कीजिये! पता नहीं अभी बहुत भावुक हो गयें हैं हम सभी। क्या बताने के लिए आये थे और क्या कह रहें हैं। ख़ैर! आप ऊपर के बेरोज़गारी, प्राइवेटाईज़ेशन, महँगाई पर बिल्कुल भी ध्यान मत दीजिये। पिछले 70 साल पर इसकी ज़िम्मेदारी डाल दीजिए। जैसे कुछ स्पेशल शादियों का बोझ हम आम शादियों पर आ जाता है। कोरोना के आने से जब पहली बार लॉकडाउन लगा तब हमें काफ़ी स्पेशल फ़ील कराया गया। हम आम शादी बिरादरी में भी सब स्पेशल लगने लगा था। सिर्फ़ 50 लोग। मास्क के साथ। डीजे नहीं।  हमें तब उन सभी लड़की पक्ष के लिए अच्छा लगा जिन्हें नॉर्मल दिनों में 5 लाख कर्ज़ लेने पड़ते। कोरोनकाल में हमारे अस्तिव से हमनें कईं पुस्तों को क़र्ज़ के चुंगल में जाने से बचते देखा। जो सक्षम लोग थे उन्होंने पुलिस वालों को भी बुलाया 200 और लोगों के साथ। अब कहाँ तक ही बताएँ। हम आम शादी हैं इंवेशटिंग ऑफिसर थोड़े न हैं।


   अभी सदियों से हमारे बिरादरी में थोड़ा बहुत नयापन आकर हमें इवॉल्व करता रहा है। कोरोना काल की आपदा में बहुत से लोगों के लिए हम अवसर बनें। उस वक़्त बहुत से कम लोगों ने फ़ोटो खिंचाया और पोस्ट किया दोस्तो को कम टैग किया कि कहीं 50 लोगों में शामिल न होने के कारण उन्हें दुःख न हो। हमें उस बात का दुःख नहीं है। हमें उतना दुःख नहीं कि बहुत से लोगों की शादियों में पहले प्रेमी ने आकर "जा सजना तुझको भूला दिया" गाया। हमकों इस बात का भी दुःख नहीं कि हमें हर बार समाज अपने हिसाब से यूज़ करे। 

प्रधानमंत्री जी!
हमें बहुत रोना इस बात का आ रहा है कि कैटरीना और विकी कौशल की शादी हम आम शादी से बहुत अलग हो रहा है। बात अलग होने तक का नहीं है। हर बिरादरी में उप बिरादरी होती है नयी बात नहीं है। लेकिन बहुत बुरा लग रहा कि सब कोई कॉमन फोटों ही शेयर कर रहा। सब सलमान ख़ान का मीम बना रहा। रणवीर कपूर की बात कर रहे हैं। ये वहीं लोग हैं जो हम आम शादियों से पहले लड़कियों को प्रेम क्यों कि के नाम पर कूटते हैं, प्रेमी को लापता कर देतें हैं। जिससे शादी होती है उस वर के सामने लड़की ने कभी किसी लड़के से बात की होगी जैसी बात दूर दूर तक नहीं लाते। लड़के का किसी से प्रेम था का ज़िक्र नहीं करते। ये सब लोग सलमान ख़ान का तेरे नाम वाला फ़ोटो शेयर कर रहे हैं। हमकों इस बात का भी कम दुःख है। हम आम शादियों में लोग मुश्किल से वीडियो कैमरा बुक करते हैं और कैसेट बनने का पैसा देते हैं। एक टाइम डिसाइड करके पूरी फैमिली के साथ देखते हैं। लेकिन ई वाले शादी में वीडियो का पैसा भी देखने वाले लोग भरेंगे। ई तो हम आम शादियों से बहुत बड़ा भेदभाव है। 

प्रधानमंत्री जी!
हम आम शादियों के साथ होने वाले इस भेदभाव को थोड़ा सा कम कीजिये। कम से कम जो लोग नहीं जा पाएं शादी में उनके लिए वीडियो तो मुफ़्त में मिले। 

भेदभाव मुक्त शादियों के उम्मीद में,
 "आम शादी बिरादरी"

Thursday, 9 December 2021

परिभाषाएं

      
   परसों रात मैं शब्दों की उत्तपत्ति, शब्दों के भाव, शब्दों की यात्रा, शब्दों का संदर्भ सभी सोचते हुए कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था। एक फोटोग्राफर भैया ने शायद मुझे तब से देख रहे थे जब मैंने शीर्षक "शब्द और जीवन" लिख लिया था। दो पैराग्राफ लिखने के बाद मैंने लिखना थोड़ा सा  रोका। वो भैया पास की कुर्सी पर आकर बैठे और पूछ लिया क्या करते हैं आप? अब ये सवाल कोई भी करता है तो मैं थोड़ी देर रुकता हूँ सोचता हूँ क्या क्या कहना है? कहना भी है कि नहीं। या बस कुछ नहीं कहकर मुस्कुरा देना है। पर उनके हाथ में कैमेरा था और महसूस हुआ कि खुलके बात की जा सकती है तो मैंने कह दिया "कभी कभी लिख लेता हूँ"। बाक़ी इंजीनियर हूँ। उन्होंने कहा "मैंने देखा आपको लिखते हुए"। शब्द और जीवन काफ़ी अच्छा शीर्षक है। मैंने मुस्कुरा कर धन्यवाद किया। उन्होंने फिर पूछा वैसे क्या लिख रहे थे? 

      मैं सोच रहा था कि शब्दों की उत्तपत्ति कैसे हुई होगी। जब सदियों पहले बिजली की आवाज़ से डर कर इंसान गुफाओं में डर कर भागा होगा उसने कैसे किसी और को बिजली के बारे में बताया होगा? पुरातत्वविदों ने बहुत सारी भाषाएँ और लिपियां ढूंढ ली हैं बहुत सी बातें पढ़ ली हैं। लेकिन बिजली के बारे में बताते समय पहले इंसान ने कैसे समझाया होगा कि "बिजली" जब भी कड़कती है तो डर लगता है, बिजली डरने की चीज़ है। दूसरे इंसान ने जब बिजली का कड़कना सुना होगा तब उसने ठीक हूबहू बताने की कोशिश की होगी ये है "बिजली" इससे डर लगता है, इससे डरना चाहिए, इसके ठीक बाद आसमान से बारिस होती है। प्रेम, द्वेष, दोस्ती, समाज, विदाई, वक़्त, परिवार सभी शब्दों के बारे में बात करते हुए मैंने कहा मैं ऐसा कुछ सोच रहा था। इतने में  वे उठें और कुछ फ़ोटो खींचकर वापस आये और कहा "सच में शब्द और भाव ज़िन्दगी के मायने बदल देते हैं, अब देखिए किसी के लिए फ़ोटो का मतलब है यादों को संजोना और मेरे लिए इसके साथ साथ है घर परिवार चलाना। अच्छा सोच रहे हैं लिखिए लिखिए। इस बातचीत के दौरान वो चार पाँच और फ़ोटो खींच चुके थे। 
     
    उन्होंने बताया वो पिछले 30 साल से फोटोग्राफी कर रहे हैं। मैंने उन्हें अपनी खींची हुई कुछ तस्वीर भी दिखाई। उन्हें काफ़ी पसंद आया। बात करते करते काफ़ी चीज़े उनके बारे में जानने को मिली। उनके फ़ोटो भी अलग अलग भाव लिए हुए अपनी यात्रा का वर्णन कर रहे थे। बहुत सारी यात्राओं और अनुभवों की बात हुई। पर "शब्द और जीवन" वहीं दो पैराग्राफ़ तक रुका है। आज के आर्मी हैलीकॉप्टर क्रैश के बारे में सुनने के बाद बस यही सोच रहा हूँ। ये मृत्यु शब्द क्या है। "मृत्यु" शब्द के बारे में सबसे पहले इंसान ने किसी को कैसे बताया होगा कि मृत्यु क्या है? उसका भाव क्या है? उसकी यात्रा क्या है? पहली बार किसने किया होगा मृत्यु को परिभाषित?

Monday, 6 December 2021

यात्राएँ



     मुझे याद नहीं रेल से जान पहचान कब हुई। रेलवे स्टेशन घर से बस 10 मिनट की दूरी पर है। शहर जाने के लिए सबसे पहली ट्रेन छे बजिया ट्रेन हुआ करती थी। हालांकि ये ट्रेन हमेशा छः बजे से पहले आती थी। शहर में रिक्शा चलाने जाने वाले लोगों के साथ साथ शहर में ट्यूशन पढ़ने जाने वाले लोगों के लिए ये ट्रेन हमेशा से साथी रही। ट्यूशन पढ़ने वाले लड़के लड़कियां शहर से ट्यूशन ख़तम कर लौटते वक्त अठ बजिया ट्रेन पकड़ते थे। हालांकि ये ट्रेन ज़्यादातर आठ बजे से लेट ही होती थी। 

       फिर 9 बजे से 10 बजे के बीच आती थी नौ बजिया ट्रेन। इस ट्रेन से मेरी जान पहचान बहुत पुरानी है। उतनी पुरानी जितनी मुझे मेरा दादी का सुनाया गया हर क़िस्सा का याद होना। इस ट्रेन से मैं अलग अलग मौके पर मिलता था। एक जब लीची के सीज़न में दादी के मायके जाते थे या रात को सपने में घबरा जाने के कारण भगत से दिखाने के लिए "जोगिया मठ" जाना होता था। हाँ, जब ठंड या बारिस के दिनों में सर्दी हो जाती थी तब सीधे शहर के बैंक रोड में "डॉक्टर गोपाल जैन" या जुरण छपरा दो नम्बर रोड "डॉक्टर ब्रजमोहन" के पास जाना होता था।

       ट्रेन में सफ़र करने से ज़्यादा यादें उसके आने के इंतिज़ार में बनी हैं। मैंने दादी को कभी टिकट काउंटर पर टिकट कटाते नहीं देखा था। एक बार जब सिर्फ़ माँ के साथ डॉक्टर के पास गया था तब माँ ने टिकट कटाया था। लौटकर मैंने दादी से पूछा "तू काहे न टिकट कटबैछही?" 
तब दादी ने पीले रंग का एक पास निकालकर दिखाया। हमारे पास महीने भर का पास है इसीलिए टिकट नहीं कटाते। उस समय तुर्की से मुज़फ़्फ़रपुर का किराया 6 रुपये था। टिकट का रंग पीला हुआ करता था। 

      ट्रेन के बारे में न जाने कितनी बातें दादी ने सिखलाया है। अगर कभी किसी चीज़ के लिए ट्रेन से उतरो और गाड़ी खुल जाए तो क्या करोगे? हम सारे भाई बहन कहते "तेज़ से दौर कर पकड़ लेंगे" दादी कहती अपने पास वाले डब्बे में चढ़ जाना। अगले स्टेशन पर फिर वहाँ पहुँचना जहाँ थे। हाँ, तब मोबाइल नहीं हुआ करता था। अगर किसी परिवार का कोई सदस्य उसी डब्बे में नहीं चढ़ा तो जी घबराहट में यही कहता था "फलां छूट गया" कैसे आएगा। ये घबराहट डर में तब बदलती जब ट्रेन मुज़फ़रपुर से लौटती हुई शाम की पचबजिया ट्रेन होती। दूर के 5 किलोमीटर तक शाम को कोई सवारी नहीं होती थी। लौटते लौटते बहुत लोगों को रात के रामायण का एक एपिसोड भी छूट जाता था। हालांकि तब टीवी किसी घर का नहीं बल्कि मोहल्ले का होता था। 

      जबसे अकेले ट्रेवल कर रहा हूँ, दादी कि ये बात याद रहती है। ट्रेन खुल जाए तो सबसे नज़दीक वाले डब्बे में चढ़ जाना। मुझे जहाँ तक याद हैं दादी के साथ हमनें अक्सर पैसेंजर ट्रेन में सफ़र किया। पहली बार स्लीपर बोगी तब देखा था जब हम एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म को जा रहे थे और पवन एक्सप्रेस को पार करना था। मैं जब दसवीं में आया तब मैंने रेलवे ज़ोन के बारे में पूरी तरह से जाना लेकिन मैं उनदिनों भी "शयनयान", पू म रे, वातानुकूलित, तृतीय श्रेणी सब पढ़ लेता था और समझता भी था। गुवाहाटी इसीलिए याद रहता मुझे की मैंने एक इंजन पर लिखा देखा था गुवाहाटी।

        दादी कहती थी जब भी ज़रूरत हो चेन खींचने की ज़रूरत पड़े तो बेझिझक खींचना । जब कोई ट्रेन चढ़ न पाए। कोई समान नीचे रह जाये। सही चीज़ कहने के लिए कभी मत डरना। ये तो पूरी ज़िंदगी की सबक है। पिछले कुछ दिनों से ट्रेन के साथ बहुत लंबा सफ़र रहा। अब प्लेटफॉर्म टिकट 50 का हो गया है। टिकट का रंग सफ़ेद हो गया है। ट्रेन बिजली पर चल रही है। रिक्शे चलाने वाले लोग कम गये हैं। तुर्की स्टेशन पर वो पीपल का पेड़ नहीं है अब जिसके नीचे बैठकर 9 बजिया का इंतिज़ार किया जाए। हाँ, दादी अब हमेशा साथ रहती हैं बताने को। "दौड़कर ट्रेन नहीं पकड़ना है"। 

     कितना कुछ बदल रहा है। कितना कुछ बदल जायेगा। रेल डीज़ल ईंजन से बिजली पर शिफ़्ट हो गयी है। मोदी जी ने ये भी कहा है कुछ दिनों में बुलेट ट्रेन भी चलने लगेगी। सबकुछ बदलता रहेगा। पर बिता हुआ बस वहीं रहता है भले ही वक़्त की कितनी ही पड़त चढ़ जाए। जाए वो यादें क़ब्र में दफ़न हो जायें। उन यादों से हमेशा कोपलें फूटती हैं। यात्राओं में यहीं कोपलें नयी यादें बनाने के लिए हमें ज़िंदा रखती हैं। 

अबतक कौन सी कोपलों ने आपको ज़िंदा रखा है?


@बोज़ो

Friday, 3 December 2021

दिल से दिल को कौन जोड़ेगा?

 

    हर समय हम एक यात्रा में होते हैं। साथी बदलते रहते हैं। जगहें बदलती रहती है। लोग बदलते रहते हैं। मौसम बदलता रहता है। जो नहीं बदलता वो है आपका जिया हुआ वक़्त। आपमें शामिल हो चुकी कुछ यादें। ज़िन्दगी का हिस्सा हो चुके कुछ सपने। 

  कुछ सपने समय के साथ दम तोड़ देते हैं। जैसे कोरोना के समय न जाने कितने सपनों ने ख़ुदकुशी की। न जाने कितनी आँखें इसीलिये नहीं सोयी की न टूटने का भरम लगा रहे। पर सच तो सच है। टूटना सच है। तो उसके टुकड़े चुभेंगे। तक़लीफ़ होगी। साँस रुक जाना चाहेंगी। हम मर जाना चाहेंगे।

  कुछ सपने बीज की तरह होते हैं। ज़ेहन में टूट कर गिरते भी हैं तो ज़िन्दगी के नए पड़ाव में उग आने की हिम्मत रखते हैं। वक़्त लाख बंज़र करना चाहे ज़िन्दगी को पर ये सपने उग आते हैं। इन सपनों को यक़ीन होता हैं "कोंपलें फिर आएंगी"। फिर यही सपने लौटते हैं अपने क़ब्र से। जगाते हैं नींद से। कहते हैं "चल उठ जा"। सवेरा हो चुका है। टूट गये हैं तो क्या! तूने ही तो कहा था "दिल से दिल को कौन जोड़ेगा? 

  कुछ सपने ज़िद्दी होते हैं। एकदम ढीठ। लाख मुश्किलें आये। लाख तूफ़ान आये। वक़्त कहे कि तेरा मर जाना ज़िंदा रहने से बेहतर है तब भी वो ठन जाते हैं लड़ने को। लड़ते रहते हैं वो सपने हक़ीक़त से। उफ़्फ़ ये ज़िद्दी सपने! इनके चिथड़े मिलते हैं हर जगह पर ये ज़िद्दी सपने अपने आप को वक़्त से रफ़्फ़ु किये बिना नहीं रुकते। एक रोज़ ये सपने हक़ीक़त का सूट पहन के चमकते हैं। यही सपने हमेशा से कहते हैं "हम जोड़ेंगे हम जोड़ेंगे"

(इस जन्मदिन पर, ये ख़ूबसूरत पल बच्चों के साथ)

तो आप बताओ 
"दिल से दिल को कौन जोड़ेगा"?

@बोज़ो

#dilse #children #bozo #birthdaygift

प्रिय प्रधानमंत्री जी! कहना क्या चाहते हैं आप?

प्रिय प्रधानमंत्री जी! पिछली चिट्ठी का जवाब आपने नहीं दिया। इसका दुःख उतना नहीं है, जितना दुःख इस बात का है कि आप हम बिहारियों क...